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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

कन्हैयालाल सेठिया (अंग्रेज़ी: Kanhaiyalal Sethia

कन्हैयालाल सेठिया (अंग्रेज़ीKanhaiyalal Sethia ; जन्म- 11 सितम्बर1919चुरूराजस्थान; मृत्यु- 11 नवम्बर2008आधुनिक काल के प्रसिद्ध हिन्दी व राजस्थानी लेखक थे। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य रचना 'पाथल व पीथल' है।[1]राजस्थान में सामंतवाद के ख़िलाफ़ इन्होंने जबरदस्त मुहिम चलायी थी और पिछड़े वर्ग को आगे लाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक, दार्शनिक तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कवि एवं लेखक के रूप में कन्हैयालाल सेठिया को अनेक सम्मान, पुरस्कार एवं अलंकरण प्राप्त हुए थे। भारत सरकार द्वारा इन्हें 'पद्म श्री' से भी सम्मानित किया जा चुका है।

जन्म तथा शिक्षा

कन्हैयालाल सेठिया का जन्म 11 सितम्बर, 1919 को राजस्थान के चुरू ज़िले में सुजानगढ़ नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम छगनमलजी सेठिया था तथा माता मनोहरी देवी थीं। कन्हैयालाल जी की प्रारम्भिक पढ़ाई कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई। स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के कारण कुछ समय के लिए इनकी शिक्षा बाधित भी हुई, लेकिन बाद में इन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.ए. स्नातक की उपाधि प्राप्त की। दर्शन, राजनीति और साहित्य इनके प्रिय विषय थे।

विवाह

वर्ष 1937 में कन्हैयालाल सेठिया जी का विवाह धापू देवी के साथ हुआ। इनके दो पुत्र- जयप्रकाश तथा विनयप्रकाश और एक पुत्री सम्पत देवी दूगड़ हैं।[2]

साहित्य चिंतन

कन्हैयालाल सेठिया के समग्र साहित्य में मूल्य बोध है। उनका व्यक्तिगत चिंतन यथार्थवादी है। सत्य को वे क़रीब से महसूस करते थे। दर्शन उनके रोम-रोम में विराजमान था तो वहीं आम आदमी उनके हर वास-उच्छ्वास में निवास करता था। कवि को कन्हैयालाल सेठिया अनुभूति का माध्यम मात्र मानते थे। उनकी रचनाओं में एक दृिष्ट पाठक को मिलती है और पाठक स्वयंमेव उद्योग के प्रति उद्धत हो उठता है। कविवर सेठिया ने कवियों को उद्देश्य युक्त रचनाओं के सृजन की ओर प्रेरित करते हुए कहा है-
"रचना वा जिण में दिखै
सिरजणियै री दीठ
नहीं स बोझो सबद रो
लद मत कागद पीठ।"

रचनाएँ

कन्हैयालाल जी की अब तक हिन्दी में 18, उर्दू में 02 व राजस्थानी में 14 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। यदि सेठिया जी के सृजन दौर का क्रमिक अध्ययन किया जाए तो शुरुआत राजस्थानी 'रमणियां रा सोरठां' (विक्रम संवत 1997) से मानी जा सकती है। इनसे इतर 'नीमड़ो' राजस्थानी की लघु पुस्तिका है। 'इरा' में चुनी हुई कविताएं हैं तो वहीं 'सप्त किरण' संयुक्त प्रकाशन है। 'परम वीर शैतानसिंह', 'जादूगर माओ', 'रक्त दो', 'चीन की ललकार' आदि लघु कृतियाँ भी सेठियाजी की ही हैं। इन सबके अलावा कन्हैयालाल सेठिया की अनेक रचनाएं अप्रकाशित हैं तथा अनेक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं। उनकी कई रचनाएं विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं।

राजस्थानी

रमणियां रा सोरठा, गळगचिया, मींझर, कूंकंऊ, लीलटांस, धर कूंचा धर मंजळां, मायड़ रो हेलो, सबद, सतवाणी, अघरीकाळ, दीठ, क क्को कोड रो, लीकलकोळिया एवं हेमाणी।

हिन्दी

वनफूल, अग्णिवीणा, मेरा युग, दीप किरण, प्रतिबिम्ब, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते, प्रणाम, मर्म, अनाम, निर्ग्रन्थ, स्वागत, देह-विदेह, आकाशा गंगा, वामन विराट, श्रेयस, निष्पति एवं त्रयी।[3]

उर्दू

ताजमहल एवं गुलचीं।

राजद्रोह का मुक़दमा

वर्ष 1942 में जब महात्मा गाँधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया, तब कन्हैयालाल सेठिया की कृति ‘अग्निवीणा’ प्रकाशित हुई, जिस पर बीकानेर राज्य में इनके ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चला और बाद में राजस्थान सरकार ने इनको स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी के रूप में सम्मानित भी किया। महात्मा गाँधी की मृत्यु पर भी कन्हैयालाल जी की एक कृति प्रकाशित हुई थी। इसमें देश बंटवारे के दौरान हुई लोमहर्षक व वीभत्स घटनाओं से जुड़ी रचनाएं संग्रहीत हैं। इसके बाद 1962 में हिन्दी की कृति ‘प्रतिबिम्ब’ का प्रकाशन हुआ। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। इसकी भूमिका हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखी है।[4]

सम्मान एवं पुरस्कार

स्वतन्त्रता संग्रामी, समाज सुधारक, दार्शनिक तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कवि एवं लेखक के नाते कन्हैयालाल सेठिया को अनेक सम्मान, पुरस्कार एवं अलंकरण प्राप्त हुए, जिनमें प्रमुख हैं[2]-
1976 - राजस्थानी काव्यकृति 'लीलटांस' पर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कृति के नाते पुरस्कृत।
1979 - हैदराबाद के राजस्थानी समाज द्वारा मायड़ भाषा की मान्यता हेतु संघर्ष के लिए सम्मानित। मायड़ भाषा को जीवन्त रखने की प्रेरणा दी।
1981 - राजस्थानी की उत्कृष्ट रचनाओं हेतु लोक संस्कृति शोध संस्थान, चूरू द्वारा 'डॉ. तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्ण पदक' सम्मान प्रदत्त।
1982 - विवेक संस्थान, कोलकाता द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए 'पूनमचन्द भूतोड़िया पुरस्कार' से पुरस्कृत।
1983 - राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा सर्वोच्च सम्मान 'साहित्य मनीषी' की उपाधि से अलंकृत। 'मधुमति' मासिक का श्री सेठिया की काव्य यात्रा पर विशेषांक एवं पुस्तक भी प्रकाशित।
1983 - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 'साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से अलंकृत।
1984 - राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा अपनी सर्वोच्च उपाधि 'साहित्य मनीषी' से विभूषित।
1987 - राजस्थानी काव्यकृति 'सबद' पर राजस्थानी अकादमी का सर्वोच्च 'सूर्यमल मिश्रण शिखर पुरस्कार' प्रदत्त।
1988 - हिन्दी काव्यकृति 'निर्ग्रन्थ' पर भारतीय ज्ञानपीठनई दिल्ली द्वारा 'मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार' प्रदत्त।
1989 - राजस्थानी काव्यकृति 'सत् वाणी' हेतु भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा 'टांटिया पुरस्कार' से सम्मानित।
1989 - राजस्थानी वेलफेयर एसोशियेसन, मुंबई द्वारा 'नाहर सम्मान'।
1990 - मित्र मन्दिर, कलकत्ता द्वारा उत्तम साहित्य सृजन हेतु सम्मानित।
1992 - राजस्थान सरकार द्वारा 'स्वतन्त्रता सेनानी' का ताम्रपत्र प्रदत्त कर सम्मानित।
1997 - रामनिवास आशादेवी लखोटिया ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा 'लखोटिया पुरस्कार' से विभूषित।
1997 - हैदराबाद के राजस्थानी समाज द्वारा मायड़ भाष की सेवा हेतु सम्मानित।
1998 - 80वें जन्म दिन पर डॉॅॅ. प्रतापचन्द्र चन्दर की अध्यक्षता में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर तथा अन्य अनेक विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा सम्मानित।
2004 - राजस्थानी भाषा संस्कृति एवं साहित्य अकादमी, बीकानेर द्वारा राजस्थानी भाषा की उन्नति में योगदान हेतु सर्वोच्च सम्मान 'पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार' से सम्मानित।
2004 - 'पद्म श्री' - भारत सरकार द्वारा
2005 - राजस्थान फाउन्डेशन, कोलकाता चेप्टर द्वारा 'प्रवासी प्रतिभा पुरस्कार' से सम्मानित।[5]
2005 - 'राजस्थान विश्वविद्यालय' द्वारा पी.एच.डी. की मानद उपाधि प्रदत्त।कन्हैयालाल सेठिया (अंग्रेज़ीKanhaiyalal Sethia ; जन्म- 11 सितम्बर1919चुरूराजस्थान; मृत्यु- 11 नवम्बर2008आधुनिक काल के प्रसिद्ध हिन्दी व राजस्थानी लेखक थे। इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य रचना 'पाथल व पीथल' है।[1]राजस्थान में सामंतवाद के ख़िलाफ़ इन्होंने जबरदस्त मुहिम चलायी थी और पिछड़े वर्ग को आगे लाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक, दार्शनिक तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कवि एवं लेखक के रूप में कन्हैयालाल सेठिया को अनेक सम्मान, पुरस्कार एवं अलंकरण प्राप्त हुए थे। भारत सरकार द्वारा इन्हें 'पद्म श्री' से भी सम्मानित किया जा चुका है।

जन्म तथा शिक्षा

कन्हैयालाल सेठिया का जन्म 11 सितम्बर, 1919 को राजस्थान के चुरू ज़िले में सुजानगढ़ नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम छगनमलजी सेठिया था तथा माता मनोहरी देवी थीं। कन्हैयालाल जी की प्रारम्भिक पढ़ाई कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुई। स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के कारण कुछ समय के लिए इनकी शिक्षा बाधित भी हुई, लेकिन बाद में इन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.ए. स्नातक की उपाधि प्राप्त की। दर्शन, राजनीति और साहित्य इनके प्रिय विषय थे।

विवाह

वर्ष 1937 में कन्हैयालाल सेठिया जी का विवाह धापू देवी के साथ हुआ। इनके दो पुत्र- जयप्रकाश तथा विनयप्रकाश और एक पुत्री सम्पत देवी दूगड़ हैं।[2]

साहित्य चिंतन

कन्हैयालाल सेठिया के समग्र साहित्य में मूल्य बोध है। उनका व्यक्तिगत चिंतन यथार्थवादी है। सत्य को वे क़रीब से महसूस करते थे। दर्शन उनके रोम-रोम में विराजमान था तो वहीं आम आदमी उनके हर वास-उच्छ्वास में निवास करता था। कवि को कन्हैयालाल सेठिया अनुभूति का माध्यम मात्र मानते थे। उनकी रचनाओं में एक दृिष्ट पाठक को मिलती है और पाठक स्वयंमेव उद्योग के प्रति उद्धत हो उठता है। कविवर सेठिया ने कवियों को उद्देश्य युक्त रचनाओं के सृजन की ओर प्रेरित करते हुए कहा है-
"रचना वा जिण में दिखै
सिरजणियै री दीठ
नहीं स बोझो सबद रो
लद मत कागद पीठ।"

रचनाएँ

कन्हैयालाल जी की अब तक हिन्दी में 18, उर्दू में 02 व राजस्थानी में 14 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। यदि सेठिया जी के सृजन दौर का क्रमिक अध्ययन किया जाए तो शुरुआत राजस्थानी 'रमणियां रा सोरठां' (विक्रम संवत 1997) से मानी जा सकती है। इनसे इतर 'नीमड़ो' राजस्थानी की लघु पुस्तिका है। 'इरा' में चुनी हुई कविताएं हैं तो वहीं 'सप्त किरण' संयुक्त प्रकाशन है। 'परम वीर शैतानसिंह', 'जादूगर माओ', 'रक्त दो', 'चीन की ललकार' आदि लघु कृतियाँ भी सेठियाजी की ही हैं। इन सबके अलावा कन्हैयालाल सेठिया की अनेक रचनाएं अप्रकाशित हैं तथा अनेक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं। उनकी कई रचनाएं विभिन्न भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं।

राजस्थानी

रमणियां रा सोरठा, गळगचिया, मींझर, कूंकंऊ, लीलटांस, धर कूंचा धर मंजळां, मायड़ रो हेलो, सबद, सतवाणी, अघरीकाळ, दीठ, क क्को कोड रो, लीकलकोळिया एवं हेमाणी।

हिन्दी

वनफूल, अग्णिवीणा, मेरा युग, दीप किरण, प्रतिबिम्ब, आज हिमालय बोला, खुली खिड़कियां चौड़े रास्ते, प्रणाम, मर्म, अनाम, निर्ग्रन्थ, स्वागत, देह-विदेह, आकाशा गंगा, वामन विराट, श्रेयस, निष्पति एवं त्रयी।[3]

उर्दू

ताजमहल एवं गुलचीं।

राजद्रोह का मुक़दमा

वर्ष 1942 में जब महात्मा गाँधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया, तब कन्हैयालाल सेठिया की कृति ‘अग्निवीणा’ प्रकाशित हुई, जिस पर बीकानेर राज्य में इनके ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चला और बाद में राजस्थान सरकार ने इनको स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी के रूप में सम्मानित भी किया। महात्मा गाँधी की मृत्यु पर भी कन्हैयालाल जी की एक कृति प्रकाशित हुई थी। इसमें देश बंटवारे के दौरान हुई लोमहर्षक व वीभत्स घटनाओं से जुड़ी रचनाएं संग्रहीत हैं। इसके बाद 1962 में हिन्दी की कृति ‘प्रतिबिम्ब’ का प्रकाशन हुआ। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। इसकी भूमिका हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने लिखी है।[4]

सम्मान एवं पुरस्कार

स्वतन्त्रता संग्रामी, समाज सुधारक, दार्शनिक तथा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कवि एवं लेखक के नाते कन्हैयालाल सेठिया को अनेक सम्मान, पुरस्कार एवं अलंकरण प्राप्त हुए, जिनमें प्रमुख हैं[2]-
1976 - राजस्थानी काव्यकृति 'लीलटांस' पर, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कृति के नाते पुरस्कृत।
1979 - हैदराबाद के राजस्थानी समाज द्वारा मायड़ भाषा की मान्यता हेतु संघर्ष के लिए सम्मानित। मायड़ भाषा को जीवन्त रखने की प्रेरणा दी।
1981 - राजस्थानी की उत्कृष्ट रचनाओं हेतु लोक संस्कृति शोध संस्थान, चूरू द्वारा 'डॉ. तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्ण पदक' सम्मान प्रदत्त।
1982 - विवेक संस्थान, कोलकाता द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए 'पूनमचन्द भूतोड़िया पुरस्कार' से पुरस्कृत।
1983 - राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा सर्वोच्च सम्मान 'साहित्य मनीषी' की उपाधि से अलंकृत। 'मधुमति' मासिक का श्री सेठिया की काव्य यात्रा पर विशेषांक एवं पुस्तक भी प्रकाशित।
1983 - हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 'साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से अलंकृत।
1984 - राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा अपनी सर्वोच्च उपाधि 'साहित्य मनीषी' से विभूषित।
1987 - राजस्थानी काव्यकृति 'सबद' पर राजस्थानी अकादमी का सर्वोच्च 'सूर्यमल मिश्रण शिखर पुरस्कार' प्रदत्त।
1988 - हिन्दी काव्यकृति 'निर्ग्रन्थ' पर भारतीय ज्ञानपीठनई दिल्ली द्वारा 'मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार' प्रदत्त।
1989 - राजस्थानी काव्यकृति 'सत् वाणी' हेतु भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा 'टांटिया पुरस्कार' से सम्मानित।
1989 - राजस्थानी वेलफेयर एसोशियेसन, मुंबई द्वारा 'नाहर सम्मान'।
1990 - मित्र मन्दिर, कलकत्ता द्वारा उत्तम साहित्य सृजन हेतु सम्मानित।
1992 - राजस्थान सरकार द्वारा 'स्वतन्त्रता सेनानी' का ताम्रपत्र प्रदत्त कर सम्मानित।
1997 - रामनिवास आशादेवी लखोटिया ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा 'लखोटिया पुरस्कार' से विभूषित।
1997 - हैदराबाद के राजस्थानी समाज द्वारा मायड़ भाष की सेवा हेतु सम्मानित।
1998 - 80वें जन्म दिन पर डॉॅॅ. प्रतापचन्द्र चन्दर की अध्यक्षता में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर तथा अन्य अनेक विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा सम्मानित।
2004 - राजस्थानी भाषा संस्कृति एवं साहित्य अकादमी, बीकानेर द्वारा राजस्थानी भाषा की उन्नति में योगदान हेतु सर्वोच्च सम्मान 'पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार' से सम्मानित।
2004 - 'पद्म श्री' - भारत सरकार द्वारा
2005 - राजस्थान फाउन्डेशन, कोलकाता चेप्टर द्वारा 'प्रवासी प्रतिभा पुरस्कार' से सम्मानित।[5]
2005 - 'राजस्थान विश्वविद्यालय' द्वारा पी.एच.डी. की मानद उपाधि प्रदत्त।

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