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बुधवार, 8 अगस्त 2018

एम.करुणानिधि/मुत्तुवेल करुणानिधि (तमिल: மு. கருணாநிதி) (3 जून 1924 - 7 अगस्त 2018)

मुथूवेल करुणानिधि का जन्म 3 जून 1924 को तिरुवरूर के तिरुकुवालाई में दक्षिणामूर्ति के नाम से हुआ था। पिता मुथूवेल तथा माता अंजुगम थीं। ईसाई वेलार समुदाय से हैं और उनके पूर्वज तिरुवरूर निवासी थे।

करुणानिधि का कहना है कि वे प्रतिदिन योगाभ्यास करते हैं, जिससे उन्हें ऊर्जा और सफलता मिलती है। उनका विवाह तीन बार हुआ है। तीन पत्नियों में से पद्‍मावती का निधन हो चुका है, जबकि दयालु और रजती जीवित हैं।

उनके 4 बेटे और 2 बेटियां हैं। बेटों के नाम एमके मुथू, जिन्हें पद्मावती ने जन्म दिया था, जबकि एमके अलागिरी, एमके स्टालिन, एमके तमिलरासू और बेटी सेल्वी दयालु अम्मल की संतानें हैं। दूसरी बेटी कनिमोझी तीसरी पत्नी रजति से हैं।

करुणानिधि अपने जीते जी अपना मकान दान कर चुके हैं। उनकी इच्छानुसार उनकी मौत के बाद इसे गरीबों के लिए एक अस्पताल में बदल दिया जाएगा। वे मांसाहार से शाकाहार की ओर आए थे। एम. करुणानिधि राजनीतिज्ञ हैं और 5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

राज्य की द्रविड़वादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) के अध्यक्ष हैं। पार्टी के संस्थापक सीएन अन्नादुराई की मौत के बाद पार्टी प्रमुख बने। अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में करुणानिधि ने कभी भी हार का मुंह नहीं देखा।

मात्र 14 की आयु में करुणानिधि ने राजनीति में प्रवेश किया और हिन्दी विरोधी आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने द्रविड़ राजनीति का एक छात्र संगठन भी बनाया। अपने सहयोगियों के लिए उन्होंने 'मुरासोली' नाम के एक समाचार पत्र का प्रकाशन किया, जो आज भी चल रहा है।

1957 में करुणानिधि पहली बार तमिलनाडु विधानसभा के विधायक बने और बाद में 1967 में वे सत्ता में आए और उन्हें लोक निर्माण मंत्री बनाया गया। 1969 में अन्ना दुराई के निधन के बाद वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। 5 बार मुख्यमंत्री और 12 बार विधानसभा सदस्य रहने के साथ-साथ वे राज्य में अब समाप्त हो चुकी विधान परिषद के भी सदस्य रह चुके हैं।

अपने कार्यकाल में करुणानिधि ने पुलों और सड़कों के निर्माण कार्य में गहरी दिलचस्पी दिखाई और बहुत से लोकप्रिय कार्यक्रम भी शुरू किए। एक सफल राजनेता, मुख्यमंत्री, फिल्म लेखक, साहित्यकार होने के साथ ही करुणानिधि एक पत्रकार, प्रकाशक और कार्टूनिस्ट भी रहे हैं।

2004 में लोकसभा चुनावों के दौरान करुणानिधि ने तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए का नेतृत्व किया था और दोनों राज्यों की सभी 40 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहे थे।

अगले चुनावों में उन्होंने 2009 में डीएमके के सांसदों की संख्या को 16 से बढ़ाकर 19 कर दिया था और यूपीए को तमिलनाडु तथा पुडुचेरी में 28 सीटें जितवाई थीं। करुणानिधि तमिल सिनेमा के नाटककार और पटकथा लेखक भी रहे हैं।

अपने समर्थकों के बीच वे कलईनार (कलाकार) पकारे जाते हैं। 1970 में पेरिस (फ्रांस) में हुए तृतीय विश्व तमिल सम्मेलन में उन्होंने उद्‍घाटन समारोह में एक विशेष भाषण दिया था। 1987 में कुआलालम्पुर (मलेशिया) में हुए 6ठे विश्व तमिल कॉन्फ्रेंस में भी उन्होंने उद्‍घाटन भाषण दिया था।
2010 में हुई विश्व क्लासिकल तमिल कॉन्फ्रेंस का अधिकृत थीम सांग एम. करुणानिधि ने ही लिखा था, जिसकी धुन एआर रहमान ने तैयार की थी। कई पुरस्कार और सम्मान उनके नाम हैं। इसके अलावा दो बार डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी नवाज़े गए।

सेतुसमुद्रम विवाद के जवाब में करूणानिधि ने हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम के वजूद पर ही सवाल उठा दिए थे। उन्होंने कहा था कि ''लोग कहते हैं कि 17 लाख साल पहले कोई शख्स था, जिसका नाम राम था। कौन हैं वो राम ? वो किस इंजीनियरिंग कॉलेज से स्नातक थे ? क्या इस बात का कोई सबूत है ?'' उनके इस सवाल और फिर टिप्पणी पर खासा बवाल हुआ था।
राजीव गांधी की हत्या की जांच करने वाले जस्टिस जैन कमीशन की अंतरिम रिपोर्ट में करुणानिधि पर लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई) को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। अंतरिम रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की थी कि राजीव गांधी के हत्यारों को बढ़ावा देने के लिए तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.करुणानिधि और डीएमके पार्टी को जिम्मेदार माना जाए।

करुणानिधि के विरोधियों, उनकी पार्टी के कुछ सदस्यों और अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने करुणानिधि पर कुल पक्षपात को बढ़ावा देने और नेहरू-गांधी परिवार की तरह एक राजनीतिक वंश का आरंभ करने की कोशिश करने के आरोप भी लगाए थे।

डीएमके को छोड़कर जाने वाले वाइको की आवाज़ विरोध में सबसे अधिक बुलंद थी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वाइको को एमके स्टालिन और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए एक खतरे मानते हुए दरकिनार किया गया।

करुणानिधि ने अपने परिवार के सदस्यों को ग़लत देखा तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने से भी गुरेज़ नहीं किया। हालांकि गलत कार्य करने का दोषी पाए जाने पर उन्होंने अपने अन्य दो बेटों एमके मुथु और एमके अलागिरी को निष्कासित कर दिया था।

इसी तरह दयानिधि मारन को भी केन्द्रीय मंत्री के पद से हटा दिया था। करुणानिधि ने अपना करियर तमिल फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक के तौर पर शुरू किया था, लेकिन बाद में अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और भाषण कला के जरिए वे एक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ बन गए। उन्होंने तमिल सिनेमा को शिवाजी गणेशन और एस.एस. राजेन्द्रन जैसे कलाकार दिए। उनके लेखन में द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का पुट रहता था। इसके चलते उनके विचारों का विरोध भी हुआ। परम्परावादी हिंदुओं ने उनकी फिल्मों का विरोध किया।
फिल्मों में लिखने के अलावा करुणानिधि ने तमिल साहित्य में भी अपना योगदान दिया। उन्होंने कविताएं, पत्र, पटकथाएं, उपन्यास, मंचीय नाटक, संवाद और गीत आदि भी लिखे। उन्होंने तमिल भाषा और कला को अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

करुणानिधि द्वारा लिखित पुस्तकों में रोमपुरी पांडियन, तेनपांडि सिंगम, वेल्लीकिलमई, नेंजुकू नीदि, इनियावई इरुपद, संग तमिल, कुरालोवियम, पोन्नर शंकर, तिरुक्कुरल उरई आदि शामिल हैं। गद्य और पद्य में लिखी उनकी पुस्तकों की संख्या 100 से भी अधिक है।

उन्होंने मनिमागुडम, ओरे रदम, पालानीअप्पन, तुक्कु मेडइ, कागिदप्पू, नाने एरिवाली, वेल्लिक्किलमई, उद्यासूरियन और सिलप्पदिकारम नाटक लिखे। 20 वर्ष की आयु में करुणानिधि ने ज्यूपिटर पिक्चर्स के लिए पटकथा लेखक के रूप में कार्य शुरू किया।

अपनी पहली ही फिल्म राजकुमारी से लोकप्रियता हासिल की। उनके द्वारा लिखी गई 75 पटकथाओं में राजकुमारी, अबिमन्यु, मंदिरी कुमारी, मरुद नाट्टू इलवरसी, मनामगन, देवकी, पराशक्ति, पनम, तिरुम्बिपार आदि शामिल हैं।


करुणानिधि का 78 साल का राजनीतिक सफर

एम.करुणानिधि ने देश की राजनीति को गहरे प्रभावित किया है.


अपनी 92 साल की उम्र में 78 साल लंबा राजनीतिक जीवन जीने वाले पूर्व मुख्‍यमंत्री एम.करुणानिधि ने न केवल तमिलनाडु की राजनीति को बल्कि देश की राजनीति को गहरे प्रभावित किया है. 14 साल की उम्र में हिन्दी-विरोधी आंदोलन से अपना राजनीतिक जीवन शुरू करके उन्होंने उन लोगों की जिन्दगी में बुनियादी बदलाव संभव किया है, जो पूरी तरह समाज के निचले पायदान पर खड़े हुए थे.
तमिलनाडु में सामाजिक स्तर पर सुधार आंदोलनों की एक लंबी परंपरा रही है. रामास्वामी पेरियार ने समाज में व्याप्त जाति और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ अहिंसक आंदोलन शुरू किया था, जिसे द्रविड़ आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है. करुणानिधि ने भी इस आंदोलन को अपनी फिल्मों व राजनीति के माध्यम से आगे बढ़ाया है. आज जिस मिड-डे मील योजना की बात पूरे देश में हो रही है, उसकी शुरुआत का श्रेय द्रविड़ आंदोलन को ही जाता है.
1969 में पहली बार बने सीएम 
1969 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने के बाद करुणानिधि का राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से गुजरा है. 1967 के बाद से तमिलनाडु की राजनीति एआईएडीएमके और डीएमके के बीच विभाजित रही है और कांग्रेस पार्टी पूरी तरह हाशिए पर जिन्दा है.
1977 में जब दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ, तब एआईएडीएमके पार्टी कांग्रेस के साथ और डीएमके जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन में थीं. तब डीएमके को केवल एक सीट और एआईएडीएमके को 19 सीटें मिली थीं. गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन के साथ ही करुणानिधि का दिल्ली की राजनीति में प्रवेश हुआ. वे तमिलनाडु में कांग्रेस-विरोध के ध्रुव के रूप में उभरे.
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वीपी सिंह को पीएम बनाने में अहम रोल 
1989 को लोकसभा चुनाव के नतीजों में डीएमके पार्टी को एक भी सीट पर विजय ‍नहीं मिल पाई थी, लेकिन करुणानिधि ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में चौधरी देवीलाल के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. संसदीय दल की बैठक में देवीलाल को नेता चुना गया था, लेकिन देवीलाल ने नेता चुने जाने के बाद प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार करके वीपी सिंह को नेता बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया था, जिसका करुणानिधि ने समर्थन किया था.
अन्य नेताअों के साथ वीपी सिंह पर करुणानिधि का भी दबाव था कि मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए. तामिलनाडु में अन्नादुराई के जमाने से पिछड़ों को आरक्षण मिला है. मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने के बाद उत्तर भारत की राजनीति में भी उबाल आ गया.
अचानक बन गए गेमचेंजर 
फिर 1991 के लोकसभा चुनाव में करुणानिधि की पार्टी डीएमके को एक भी सीट पर विजय नहीं मिलीं. नतीजा यह हुआ कि दिल्ली की राजनीति में उनका वजूद काफी कम हुआ. राव सरकार के मंत्री अर्जुन सिंह ने डीएमके नेताअों पर आरोप लगाया था कि राजीव गांधी की हत्या में उनका हाथ था. 1996 के लोकसभा चुनाव में डीएमके को 17 और उसकी सहयोगी तमिल मनीला कांग्रेस को 20 सीटें प्राप्त हुई. दिल्ली में करुणानिधि अचानक प्रधानमंत्री बनाने वाले नेता बन गए.
फिर तमिलनाडु भवन और करुणानिधि देश की राजनीति के केन्द्र में आ गए. करुणानिधि चाहते थे कि वीपी सिंह फिर प्रधानमंत्री बनें, लेकिन वीपी सिंह दिल्ली की रिंग रोड पर चक्कर काटते रहें. वीपी सिंह फिर प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते थे. अंतत: करुणानिधि के सुझाव पर एच.डी. देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाया गया.
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यूपीए सरकार में करुणानिधि की खास भूमिका रही.
फिर कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी द्वारा देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद इंद्रकुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनने में भी करुणानिधि ने निर्णायक भूमिका निभाई. इसी दौरान कांग्रेस के नेताअों के साथ उनके रिश्ते बने. ‍
यूपीए और एनडीए दोनों में शामिल
1998 में एआईएडीएमके के समर्थन वापस लेने से अटल बिहारी वाजेपयी की सरकार गिर गई. फिर 1999 के लोकसभा में डीएमके एनडीए का हिस्सा बन गई. 2004 के लोकसभा चुनाव के पहले ही डीएमके ने एनडीए का साथ छोड दिया. करुणानिधि यूपीए के संस्थापक सदस्यों में एक हैं.
फिर मनमोहन सिंह सरकार में करुणानिधि का दबदबा इतना अधिक था कि वे ही तय करते थे कि उनकी पार्टी से जुड़े मंत्रियों को कौन-से विभाग मिलने चाहिए. मनमोहन सिंह चाहते हुए भी दयानिधि मारन को संचार मंत्रालय से नहीं हटा पाए.
बाद में जब 2जी में भ्रष्टाचार को लेकर विवाद इतना गंभीर हो गया कि डा. मनमोहन सिंह को डीएमके के मंत्री ए. राजा व करुणिानिधि की बेटी कनिमोझी को जेल भिजवाना पड़ा. ऐसी स्थिति में करुणानिधि के सामने कांग्रेस पार्टी से अपना रिश्ता खत्म करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. करुणानिधि आज उम्र के इस पड़ाव पर राजनीतिक अकेलेपन का सामना कर रहे हैं.


तमिल राजनीति के एक पुरोधा का अवसान, 94 वर्ष की उम्र में एम करुणानिधि ने ली अंतिम सांस

Karunanidhi Death : तमिल राजनीति के धुरंधर डीएमके नेता करुणानिधि का मंगलवार शाम निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। 94 वर्ष की उम्र में उन्होंने चेन्नई के कावेरी अस्पताल में अंतिम सांस ली।
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94 वर्ष की उम्र में एम करुणानिधि का निधन |तस्वीर साभार: ANI
चेन्नई: तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और तमिल राजनीति के दिग्गज नेताओं में से एक एम करुणानिधि का मंगलवार शाम देहांत हो गया। वह 94 वर्ष के थे। करुणानिधि के निधन पर तमिलनाडु में शोक की लहर है। डीएमके समर्थकों को विश्वास नहीं हो रहा है उनके नेता अब इस दुनिया में नहीं रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित राजनीतिक की दिग्गज हस्तियों ने करुणानिधि के निधन पर अपनी शोक-संवेदना प्रकट की है।
करुणानिधि के निधन से तमिल राजनीति को दो साल के अंतराल में दूसरा बड़ा झटका लगा है। इससे पहले एआई़डीएमके प्रमुख जे जयाललिता का लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया था। करुणानिधि को 27 जुलाई को देर रात तबीयत खराब होने की वजह से चेन्नई के कावेरी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके लिए अस्पताल में स्पेशल आईसीयू सेटअप किया गया था।
3 जून 1924 को जन्मे करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 10 फरवरी 1969 को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह तमिलनाडु की सत्ता पर सबसे ज्यादा समय तक काबिज रहने वाले मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने 6,863 दिन तक मुख्यमंत्री का पद संभाला। उन्होंने 60 साल के राजनीतिक करियर में अपनी भागीदारी वाले हर चुनाव में अपनी सीट जीतने का रिकॉर्ड बनाया।


पांच बार बने राज्य के मुख्यमंत्री
डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुरई की मौत के बाद करुणानिधि पार्टी के नेता बने। इसके बाद से साल 2011 तक वह पांच बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 27 जुलाई 2018 को करुणानिधि ने भारतीय राजनीत में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। शुक्रवार को उन्होंने डीएमके अध्यक्ष के रूप में 50 साल पूरे किए। वह एेसी विशिष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले देश के पहले राजनेता थे। 27 जुलाई 1969 को उन्होंने डीएमके पार्टी अध्यक्ष का पद संभाला था। इसके पांच महीने पहले उन्हें पार्टी के विधायक दल का नेता चुना गया था और वो पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। तब से लेकर अब तक वो इस पद पर बने हुए थे।

तमिल फिल्मों में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में की करियर की शुरुआत
तमिल फिल्म जगत में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में करुनानिधि ने अपने करियर की शुरुआत की थी। वे द्रविड़ आंदोलन से जुड़े थे। अपने ज्ञान और भाषण देने की कला में माहिर होने की वजह से वो बहुत जल्दी एक कुशल राजनेता बन गए। करुणानिधि समाजवादी आदर्शों को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक कहानियां लिखने के लिए मशहूर थे।

करुणानिधि ने राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए तमिल सिनेमा बेहतरीन इस्तेमाल किया। उन्होंने पराशक्ति नामक फिल्म के माध्यम से अपने राजनीतिक विचारों का लोगों के बीच प्रचार करना शुरू किया। यह फिल्म तमिल सिनेमा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसमें द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा का समर्थन किया गया था। शुरुआत में इस फिल्म पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था लेकिन साल 1952 में इसे रिलीज कर दिया गया। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस में बड़ी हिट साबित हुई। 

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