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गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

सैयद हसन इमाम (अंग्रेज़ी: Syed Hasan Imam, जन्म- 31 अगस्त, 1871

सैयद हसन इमाम (अंग्रेज़ीSyed Hasan Imam, जन्म- 31 अगस्त1871, नियोरा, पटना ज़िला; मृत्यु- 19 अप्रैल1933) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, समाज सुधारक एवं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे।

परिचय

हसन इमाम का जन्म 31 अगस्त1871 को ज़िला पटना के नियोरा में हुआ था। उनके पिता इमदाद इमाम थे। शिया मुस्लिम मत को मानने वाला यह परिवार प्रतिष्ठित, शिक्षित मध्यम वर्ग का था। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद खराब स्वास्थ्य के कारण उनकी पढ़ाई में अक्सर बाधा रहती थी इसलिए वह इंग्लैंड चले गये।

न्यायिक कॅरियर

हसन इमाम जुलाई1889 में इंग्लैंड जाकर मिडिल टेंपल में शामिल हो गए। वहां रहते हुए वह दादाभाई नौरोजी के लिये 1891 में इंग्लैंड के आम चुनाव के दौरान सक्रिय रूप से अभियान चलाते रहे। उन्हें 1892 में बार में बुला लिया गया; इसी साल वे वापस घर लौट आये और कलकत्ता उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस शुरू कर दी। हसन इमाम कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। मार्च1916में पटना उच्च न्यायालय की स्थापना पर इमाम ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफ़ा दिया और पटना में प्रैक्टिस शुरू कर दी।[1]

राजनीतिक कॅरियर

हसन इमाम 1921 में बिहार व उड़ीसा की विधान परिषद के सदस्य मनोनीत किये गये। 1908 के बाद से उन्होंने राजनीतिक मामलों में हिस्सा लिया। अक्टूबर1909 में उन्हें बिहार कांग्रेस समिति का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया और अगले महीने उन्होंने बिहार छात्र सम्मेलन के चौथे सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने 1916 में न्यायाधीश पद से इस्तीफ़े के बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक गतिविधि की फिर से शुरुआत की। नवंबर1917 में भारत राज्य के सचिव मोंटेगू द्वारा बुलाये गये प्रमुख भारतीय नेताओं में से हसन इमाम एक थे और उसके द्वारा ‘‘भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के वास्तविक दिग्गजों’’ के बीच इमाम को भी सूचीबद्ध किया गया था। हसन इमाम ने मोंटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार योजना पर विचार करने के लिए 1918 में बंबई में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष सत्र की अध्यक्षता की। यह बेहद महत्त्वपूर्ण और बेहद ही मुश्किल सत्र था क्योंकि इसमें योजना की विशेषताओं पर मतभिन्नता थी। उन्होंने इसमें उदारवादी भूमिका निभाई।[1]

समाज सुधारक

एक कट्टर संविधानविद् के नाते उन्होंने असहयोग आंदोलन की विचारधारा का विरोध किया था। हसन इमाम ने खिलाफत आंदोलनमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। वह 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हो गए और पटना में गठित स्वदेशी लीग के सचिव चुने गए। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और खादी के इस्तेमाल के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाया। इससे पहले वह 1927में बिहार में साइमन कमीशन के बहिष्कार की सफलता के वास्तविक सूत्रधार थे। हसन इमाम विशेष रूप से सामाजिक सुधारों, महिलाओं और दलित वर्गों की स्थिति की सुधार की वकालत करते थे। टिकरी बोर्ड न्यास के सदस्य के रूप में उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए योजनाओं को बढ़ावा दिया। उन्होंने कंपनी और शाही शासन दोनों के तहत देश के आर्थिक शोषण को उजागर किया। वह बिहार के प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक बेहरे के न्यासी बोर्ड के अध्यक्ष थे। वह सफल सर्चलाइट के संस्थापकों में से भी एक थे।[1]

निधन

19 अप्रैल1933 को सैयद हसन इमाम का निधन हो गया और उन्हें ज़िला शाहाबाद के जपाला में दफ़नाया गया।

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