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मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

आसाराम अथवा आसाराम बापू (अंग्रेज़ी: Asaram Bapu, जन्म: 17 अप्रॅल, 1941, सिंध)

आसाराम अथवा आसाराम बापू (अंग्रेज़ीAsaram Bapu, जन्म: 17 अप्रॅल1941सिंध) एक भारतीय आत्मज्ञानी संत, कथावाचक एवं आध्यात्मिक गुरु हैं। आसाराम का वास्तविक नाम 'आसुमल थाऊमल सिरूमलानी' है। आसाराम सामान्यतः आपराधिक मामलों में उनके ख़िलाफ़ दायर याचिकाएँ, उनके आश्रम द्वारा अतिक्रमण, 2012 दिल्ली दुष्कर्म पर उनकी टिप्पणी एवं 2013 में नाबालिग लड़की का कथित यौन शोषण जैसे विवादों से जुड़े रहे हैं। उन पर लगे आरोपों की आँच उनके बेटे नारायण साईं तक पहुँच चुकी है। न्यायालय ने उन्हें न्यायिक हिरासत में रखने का निर्णय लिया है। वर्तमान में आसाराम जोधपुर जेल की सलाखों के पीछे कैद हैं।

जीवन परिचय

आसाराम का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में सिंधु नदी के तट पर बसे बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरूमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 तदनुसार विक्रम संवत 1998 को चैत्र वदी षष्ठी के दिन हुआ था। इनकी माताजी का नाम महँगीबा है। उस समय नामकरण संस्कार के दौरान इनका नाम आसुमल रखा गया था।

बाल्यावस्था

आसाराम का बाल्यकाल संघर्षों की एक लंबी कहानी हैं। विभाजन की विभिषिका को सहनकर भारत के प्रति अत्यधिक प्रेम होने के कारण इनका परिवार अपनी अथाह चल-अचल सम्पत्ति को छोड़कर अहमदाबाद शहर में 1947 में आ पहुँचा। अपना धन-वैभव सब कुछ छूट जाने के कारण वह परिवार आर्थिक विषमता के चक्रव्यूह में फँस गया लेकिन आजीविका के लिए किसी तरह से पिताश्री थाऊमलजी द्वारा लकड़ी और कोयले का व्यवसाय आरम्भ करने से आर्थिक परिस्थिति में सुधार होने लगा। तत्पश्चात् शक्कर का व्यवसाय भी आरम्भ हो गया।

शिक्षा

आसाराम की प्रारम्भिक शिक्षा सिन्धी भाषा से आरम्भ हुई। तदनन्तर सात वर्ष की आयु में प्राथमिक शिक्षा के लिए इन्हें 'जयहिन्द हाईस्कूल', मणिनगर, (अहमदाबाद) में प्रवेश दिलवाया गया। अपनी विलक्षण स्मरणशक्ति के प्रभाव से ये शिक्षकों द्वारा सुनाई जाने वाली कविता, गीत या अन्य अध्याय तत्क्षण पूरी की पूरी हू-ब-हू सुना देते थे। विद्यालय में जब भी मध्यान्ह की विश्रान्ति होती, बालक आसुमल खेलने-कूदने या गप्पेबाजी में समय न गँवाकर एकांत में किसी वृक्ष के नीचे ईश्वर के ध्यान में बैठ जाते थे। चित्त की एकाग्रता, बुद्धि की तीव्रता, नम्रता, सहनशीलता आदि गुणों के कारण बालक का व्यक्तित्व पूरे विद्यालय में मोहक बन गया था। अपने पिता के आसाराम लाड़ले संतान थे। अतः पाठशाला जाते समय पिताश्री इनकी जेब में पिश्ता, बादाम, काजू, अखरोट आदि भर देते थे जिसे आसुमल स्वयं भी खाते एवं प्राणिमात्र में इनका मित्रभाव होने से ये परिचित-अपरिचित सभी को भी खिलाते थे। पढ़ने में ये बड़े मेधावी थे तथा प्रतिवर्ष प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण होते थे, फिर भी इस सामान्य विद्या का आकर्षण इन्हें कभी नहीं रहा। लौकिक विद्या, योग विद्या और आत्म विद्या ये तीन विद्याएँ हैं, लेकिन इनका पूरा झुकाव योग विद्या पर ही रहा।

परिवार

माता-पिता के अतिरिक्त आसाराम के परिवार में एक बड़े भाई तथा दो छोटी बहनें थीं। बालक आसुमल को माताजी की ओर से धर्म के संस्कार बचपन से ही दिये गये थे। माँ इन्हें ठाकुरजी की मूर्ति के सामने बिठा देतीं और कहतीं- “बेटा, भगवान की पूजा और ध्यान करो। इससे प्रसन्न हो कर वे तुम्हें प्रसाद देंगे।” वे ऐसा ही करते और माँ अवसर पाकर उनके सम्मुख चुपचाप मक्खन-मिश्री रख जातीं। बालक आसुमल जब आँखें खोलकर प्रसाद देखते तो प्रभु-प्रेम में पुलकित हो उठते थे।

विवाह

तरुणाई के प्रवेश के साथ ही घरवालों ने इनकी शादी करने की तैयारी की। वैरागी आसुमल सांसारिक बंधनों में नहीं फँसना चाहते थे इसलिए विवाह के आठ दिन पूर्व ही वे चुपके से घर छोड़ कर निकल पड़े। काफ़ी खोजबीन के बाद घरवालों नें उन्हें भरूच के एक आश्रम में पा लिया। "चूँकि पूर्व में सगाई निश्चित हो चुकी है, अतः संबंध तोड़ना परिवार की प्रतिष्ठा पर आघात पहुँचाना होगा। सभी परिवारजनों के बार-बार इस आग्रह के वशीभूत होकर तथा तीव्रतम प्रारब्ध के कारण उनका विवाह हो गया, किन्तु आसुमल उस स्वर्णबंधन में रुके नहीं। अपनी सुशील एवं पवित्र धर्मपत्नी लक्ष्मी देवी को समझाकर अपने परम लक्ष्य ‘आत्म-साक्षात्कार’ की प्राप्ति तक संयमी जीवन जीने का आदेश दिया। अपने पूज्य स्वामी के धार्मिक एवं वैराग्यपूर्ण विचारों से सहमत होकर लक्ष्मी देवी ने भी तपोनिष्ठ एवं साधनामय जीवन व्यतीत करने का निश्चय कर लिया।

गुरु की प्राप्ति

स्वामी लीलाशाहजी महाराज इनके गुरु थे। वह बड़ी अमृतवेला कही जाती है, जब ईश्वर की खोज के लिए निकले परम वीर पुरुष को ईश्वर प्राप्त किसी सदगुरु का सान्निध्य मिलता है। उस दिन को नवजीवन प्राप्त होता है। गुरु के द्वार पर भी कठोर कसौटियाँ हुई थीं, लेकिन परमात्मा के प्यार में तड़पता यह परम वीर पुरुष सारी-की-सारी कसौटियाँ पार करके सदगुरुदेव का कृपाप्रसाद पाने का अधिकारी बन गया। सदगुरुदेव ने साधना-पथ के रहस्यों को समझाते हुए आसुमल को अपना लिया। आध्यात्मिक मार्ग के इस पिपासु-जिज्ञासु साधक की आधी साधना तो उसी दिन पूर्ण हो गई जब सदगुरु ने अपना लिया। परम दयालु सदगुरु साईं लीलाशाहजी महाराज ने आसुमल को घर में ही ध्यान भजन करने का आदेश देकर 70 दिन तक वापस अहमदाबाद भेज दिया।

आश्रम की स्थापना

साबरमती नदी के किनारे की उबड-खाबड़ टेकरियों (मिट्टी के टीलों) पर भक्तों द्वारा आश्रम के रूप में 29 जनवरी 1972 को एक कच्ची कुटिया तैयार की गई। इस स्थान के चारों ओर कंटीली झाड़ियाँ व बीहड़ जंगल था, जहाँ दिन में भी आने पर लोगों को चोर-डाकुओं का भय बराबर बना रहता था। लेकिन आश्रम की स्थापना के बाद यहाँ का भयावह एवं दूषित वातावरण एकदम बदल गया। वर्तमान में इस आश्रमरूपी विशाल वृक्ष की शाखाएँ भारत में ही नहीं, विश्व के अनेक देशों तक पहुँच चुकी हैं। साबरमती के बीहड़ों में स्थापित यह कुटिया आज ‘संतश्री आसारामजी आश्रम’ के नाम से एक महान् पावन तीर्थधाम बन चुकी है।
Asaram Bapu – आसाराम बापू के करीब 40 मिलियन से ज्यादा अनुयायी है। उनके सभी अनुयायी उन्हें आसाराम बापू या यु कहे तो केवल बापूजी नाम से जानते है बल्कि उनका पूरा नाम असुमल सिरुमलानी हैं।

 आसाराम बापू का जीवन परिचय – Asaram Bapu Biography

आसाराम बापू का जन्म 17 अप्रैल 1941 को ब्रिटिश भारत के नवाबशाह जिले के बेराणी गाँव में ( जो अब पाकिस्तान में है) हुआ। उनके मातापिता का नाम मेंगिबा और थाउमल सिरुमलानी है।
लेकिन भारत स्वतंत्र होने के बाद वो ख़ुद के परिवार के साथ में अहमदाबाद रहने के लिए आये। बाद में फिर उनका परिवार अहमदाबाद आने के बाद उनके पिता ने कोयला और लकड़ी का धंदा शुरू कर दिया था। आसाराम बापू बापू के पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपना स्कूल छोड़ दिया था तब वह कक्षा तीसरी में पढ़ रहे थे। बाद कुछ समय तक उनके पिता का कारोबार संभाला।
उनके आश्रम ने उनका एक चरित्र लिखा है उस चरित्र ‘संत आसाराम बापू बापूजी की जीवन झाकी’ के अनुसार आसाराम बापू ख़ुद के शादी के आठ दिन पहले भरूच के आश्रम में भाग गए थे। तब उनकी उम्र केवल 15 साल की थी। उस वक्त उनके परिवार ने उन्हें बहुत समझाने पर वो घर वापसे आ गए थे और तब जाकर उनकी शादी लक्ष्मी देवी से हो सकी।
लेकिन एक बार फिर भगवान की खोज करने के लिए उन्होंने उम्र के केवल 23 साल में ही घर छोड़ दिया और उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के तीर्थ के जगह पर घूमना शुरू कर दिया था। वहापर उनकी मुलाकात नैनीताल में अध्यात्मिक गुरु लीलाशाह से हुई थी।
आसाराम बापू को उनका शिष्य बनने की बड़ी इच्छा थी लेकिन उन्होंने आसाराम बापू को फिर एक बार घर वापस जाने को कहा था। लीलाशाह ने ही उन्हें 7 अक्तूबर 1964 को आसाराम बापू नाम दिया था। आसाराम बापू और लक्ष्मी को दो बच्चे है। उनका लड़का नारायण साई भी एक धार्मिक गुरु है।
आसाराम बापू आध्यात्मिकता का प्रसार करने के लिए भारत के सभी शहरों में अध्यात्मिकता का प्रसार करते है। वह केवल एक भगवान की भक्ति करने पर विश्वास रखते है और भक्ति योग, ज्ञान योग और कर्म योग का महत्व बताते है।
एक बार 2012 में आसाराम बापू एक कॉलेज में भाषण देने के लिए जा रहे थे तभी उनका हेलीकाप्टर निचे उतरते समय क्रेश हो गया था लेकिन सभी बच निकले थे।
‘संत आसाराम बापू बापूजी की जीवन झाकी’ के अनुसार आसाराम बापू 8 जुलाई 1971 को अहमदाबाद को वापस आ गए थे। 29 जनवरी 1972 को उन्होंने साबरमती नदी के किनारे पर मोटेरा में मठ की स्थापना की थी।
लेकिन उनका जो अधिकृत चरित्र है उसमे वो कहा रहते थे उसके बारे कोई जानकारी नहीं दी गयी, लेकिन वो ख़ुद का मठ बनवाने से पहले आसाराम बापू मोटेरा के सदाशिव आश्रम में दो साल तक रह चुके थे।
उन्होंने 1973 में उनके मठ का रूपांतर आश्रम में करवाया था उस वक्त उनके 5-10 अनुयायी थे।
आसाराम बापू के बहुत सारे आश्रमों को क़ानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। 2000 में गुजरात सरकार ने आसाराम बापू के आश्रम को नवसारी जिले के भैरवी गाव में करीब 10 एकर (4हेक्टर) की जमीन दी थी।
लेकिन उनके आश्रम ने गाव की 6 एकर (2 हेक्टर) और जमीन हड़प ली जिसके कारण गाव के लोगोंने आश्रम का जमकर विरोध किया। गाव के लोगों उसके खिलाफ कई सारी शिकायते दर्ज की, आश्रम को बहुत बार चेतावनी भी दी लेकिन उन चेतावनी का आश्रम पर कोई असर नहीं पड़ा।
इसीलिए जिले के अधिकृत संस्थानों ने पुलिस की मदत से आश्रम की जमीन पर बुलडोजर चलाके आश्रम को वहासे हटा दिया और जमीन सरकार को सौप दी।
2013 तक उनके देश में और विदेश मे कुल मिलाके लगभग 400 से अधिक आश्रम है।
2008 तक आसाराम बापू बापू के करीब 40 गुरुकुल (स्कूल) थे। 2008 में आसाराम बापू के गुरुकुल में 4 लडको की मौत हो गयी थी। ऐसे आरोप लगाये गए थे की आश्रम में काला जादू के नाम पर उन लडको को मार दिया गया था।
जुलाई 2008 में सात अनुयायी ने आसाराम बापू बापू और आश्रम के खिलाफ मामला दर्ज कर दिया था। उच्च नायालय ने भी आसाराम बापू बापू के गुरुकुल में हुई दो लडको की मौत की छानबीन करने के आदेश गुजरात सीआईडी को दिए थे।
लेकिन उस मामले के छानबीन करनेवाले डीएसपी ने जो रिपोर्ट नायाधिश को सौपी थी लेकिन उस रिपोर्ट के मुताबिक आश्रम में कोई काला जादू इस्तेमाल करने का सबूत नहीं मिल सका।
रिपोर्ट यह भी कहती है की आश्रम का सारा इलाका छानबीन किया गया, आश्रम की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी की गयी लेकिन काला जादू इस्तेमाल करने का कोई सबूत नहीं मिल सका।
अगस्त 2013 में एक 16 साल की लड़की ने आसाराम बापू पर यौन शोषण का इलजाम लगाया था। उस लड़की ने जो इलजाम लगाये थे वो साबित होने के बाद दिल्ली पुलिस ने लड़की के माता पिता के कहने पर मामला दर्ज कर लिया था।
जब 31 अगस्त को पूछताछ के लिए बुलाये जाने पर भी ना आने पर दिल्ली पुलिस ने आसाराम बापू के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के दफा 342 (गलत तरीक़े से कारवास), 376 (बलात्कार), 506 (अपराधिक धमकी), और किशोर न्याय अधिनियम और यौन अपराध कानून से बच्चों का संरक्षण के कुछ दफा के तहत उसपर मामला दायर कर दिया था।
आखिरकार 1 सितम्बर 2013 को पुलिस ने आसाराम बापू को जोधपुर के आश्रम से और दिसंबर 2013 में आसाराम बापू के लड़के नारायण साई को गिरफ्तार कर लिया और तबसे वो जेल में ही है और कई बार उसकी जमानत भी ख़ारिज कर दी गयी।

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