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रविवार, 11 मार्च 2018

वी. शांता (अंग्रेज़ी: V. Shanta, जन्म- 11 मार्च, 1927, माइलापुर, मद्रास

वी. शांता (अंग्रेज़ीV. Shanta, जन्म- 11 मार्च1927, माइलापुर, मद्रासभारत की ऐसी महिला हैं, जिन्हें उनके जनकल्याणकारी कार्यों के लिए वर्ष 2005 में 'रेमन मैग्सेसे पुरस्कार' दिया गया था। उनका पूरा नाम डॉ. विश्वनाथन शांता है। भारत में कैंसर के रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। विशेष रूप से पुरुषों में गले, फेफड़ों तथा पेट का कैंसर, प्रमुखता से देखा जाता है जो तम्बाकू के कारण होता है। स्त्रियों में गर्दन तथा स्तन का कैंसर सबसे ज्यादा देखा जाता है। इसके बावजूद लम्बे समय से इस दिशा में कोई खोजपरक काम तथा इसके इलाज के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। डॉ. वी. शांता ने 'चेन्नई कैंसर इन्टीट्‌यूट' में इस ओर बहुत काम किया और इस उपेक्षित क्षेत्र में इलाज तथा अनुसंधान दोनों को अपने निर्देशन में सम्पन्न किया। उनको उनके द्वारा जनकल्याणकारी कार्य के लिए मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया।

परिचय

डॉ. वी. शांता का जन्म 11 मार्च, 1927 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के माइलापुर में हुआ था। उनका परिवार प्रबुद्ध और ख्याति प्राप्त लोगों से उजागर था। 'नोबेल पुरस्कार' प्राप्त वैज्ञानिक एस. चन्द्रशेखर उनके मामा थे और प्रसिद्ध वैज्ञानिक तथा नोबेल पुरस्कार विजेता सी. वी. रमन उनके नाना के भाई। इस नाते उनके सामने उच्च आदर्श के उदाहरण बचपन से ही थे। वी. शांता की स्कूली शिक्षा चेन्नई में नेशनल गर्ल्स हाईस्कूल से हुई, जो अब सिवास्वामी हायर सेकेन्डरी स्कूल बन गया है। शांता की बचपन से डॉक्टर बनने की इच्छा थी। उन्होंने 1949 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया तथा 1955 में उनका पोस्ट ग्रेजुएशन एम.डी. पूरा हुआ।[1]

कैंसर इंस्टीट्यूट के लिए कार्य

इसी दौरान 1954 में डी. मुत्तुलक्ष्मी रेड्‌डी ने कैंसर इन्टीट्यूट की स्थापना की थी। वी. शांता ने पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा में सफल होकर वुमन एण्ड चिल्ड्रेन हॉस्पिटल में सेवारत होने का आदेश पा लिया था, जो कि एक बेहद सम्मानित उपलब्धि थी। लेकिन जब कैंसर इन्टीट्यूट का विकल्प सामने आया तो उन्होंने बहुतों को नाराज करते हुए वुमन एण्ड चिल्ड्रेन हॉस्पिटल का प्रस्ताव छोड़कर कैंसर इन्टीट्‌यूट का काम ही स्वीकार कर लिया। 13 अप्रैल1955 को वी. शांता कैंसर इन्टीट्यूट के परिसर में पहुँची और वहीं जम गईं। यह शांता की मानवीय संवेदना का एक प्रमाण बना। इन्स्टीट्यूट जब शुरू हुआ था, तब उसके पास एक छोटी-सी बिल्डिंग थी, बहुत थोड़े चिकित्सा प्रबन्ध थे तथा उनके साथ केवल एक और डॉक्टर थीं, जिनका नाम कृष्णमूर्ति था। पहले तीन वर्ष वी. शांता ने वहाँ अवैतनिक स्टॉफ की तरह काम किया उसके बाद उन्हें दो सौ रुपये प्रतिमाह तथा अस्पताल के परिसर में ही आवास दिया गया।
इस संस्थान में वी. शांता ने देश के पहले शिशु कैंसर क्लीनिक की नींव रखी। शांता ने देश में किया जाने वाला पहला अध्ययन सर्वेक्षण किया और उसके आधार पर देश में पहला ऐसा कार्यक्रम बनाया गया, जिसका उद्देश्य था कि गाँवों में, कैंसर की एकदम शुरुआती स्टेज पर ही पहचान की जा सके। वी. शांता ने उस कैंसर इंस्टिट्यूट में रहते हुए अपने भीतर के गहरे जुनून का परिचय दिया। उन्होंने जब तम्बाकू को पुरुषों में कैंसर पैदा करने वाले तत्व की तरह जाना तो कैंसर पर रोक-थाम की जिद में उन्होंने पुरुषों के लिए तम्बाकू छुड़ाने वाला क्लीनिक खोल दिया।[1]





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