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रविवार, 11 मार्च 2018

चन्द्रभानु गुप्त (जन्म- 14 जुलाई, 1902 ई., अलीगढ़, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 11 मार्च,

चन्द्रभानु गुप्त (जन्म- 14 जुलाई1902 ई., अलीगढ़उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 11 मार्च1980 ई.) भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन पर 'आर्य समाज' का बहुत गहरा प्रभाव था। वर्ष 1926 से ही सी.बी. गुप्त 'उत्तर प्रदेश कांग्रेस' और 'अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी' के सदस्य बन गए थे। कई विभागों में मंत्री रहने के बाद चन्द्रभानु जी वर्ष 1960 से 1963 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में भी अनेक काम किए। लखनऊ और गोरखपुर जैसे शहरों को आधुनिक व विकासशील बनाने की पहल करने वाले सी.बी गुप्त को लोग मजबूत प्रशासन, जुझारू नेतृत्व व बड़प्पन के लिए आज भी याद करते हैं।

जन्म तथा शिक्षा

चन्द्रभानु गुप्त का का जन्म 14 जुलाई, 1902 को उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ ज़िले के 'बिजौली' नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम हीरालाल था। चन्द्रभानु जी के पिता को अपने समाज में बहुत ही मान-सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त थी। चन्द्रभानु गुप्त के चरित्र निर्माण में 'आर्य समाज' का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और भावी जीवन में आर्य समाज के सिद्धान्त उनके मार्ग दर्शक रहे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा लखीमपुर खीरी में हुई। बाद में वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लखनऊ चले आए। यहाँ 'लखनऊ विश्वविद्यालय' से एम.ए. और एलएल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद नवाबों का शहर लखनऊ ही उनका कार्यक्षेत्र बन गया।

राजनीति में प्रवेश

शिक्षा पूर्ण करने के बाद गुप्त जी ने लखनऊ में वकालत आरम्भ की। लगभग पाँच फुट और चार इंच के कद वाले वाले चन्द्रभानु, जो कि एक पढ़ाकू युवक थे, उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन वह महात्मा गाँधी के विभिन्न आन्दोलनों से प्रेरित ज़रूर थे। 1916 में घर वालों की मर्जी के बिना पाँच रुपये जेब में डालकर वे लखनऊ में हुए कांग्रेस के एक जलसे में हिस्सा लेने पहुँच गए थे। उस समय लोकमान्य तिलक का जुलूस कैसरबाग़ होते हुए चारबाग़ की तरफ़ आ रहा था। बांसमंडी चौराहे पर सी.बी. गुप्त को लोकमान्य तिलक के पैर छूने का मौका मिला। पैर छूते उन्हें न जाने कैसी प्रेरणा मिली कि उनके कदम सक्रिय राजनीति की ओर बढ़ चले। फिर तो राजनीति और समाज सेवा में ऐसी पैठ बनाई कि 1960 के दिसम्बर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए।[1]

प्रसिद्धि

अपने जुझारूपन और खरी बात बोलने के कारण सी.बी. गुप्त युवा राजनीति में तेजी से उभरे। वर्ष 1919 में 'रौलट एक्ट' के विरोध में प्रदर्शन करने के बाद कांग्रेसजन चन्द्रभानु जी की क्षमताओं के कायल हो गए। 'काकोरी रेल कांड' के क्रांतिकारियों के बचाव पक्ष में वकालत करने के बाद तो वह सुर्खियों में आ गए। कांग्रेस को एक ऐसे ही तेजतर्रार युवा की ज़रूरत थी। चन्द्रभानु गुप्त को 1928 में लखनऊ शहर कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। कानपुर में हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में लखनऊ से डेलीगेट भी चुने गए। पूरे राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने सक्रिय सिपाही की भूमिका निभाई।


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