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शनिवार, 18 नवंबर 2017

मेजर शैतान सिंह जीवन परिचय हिंदी में | SHAITAN SINGH BIOGRAPHY

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शैतान सिंह जीवन परिचय हिंदी में | SHAITAN SINGH BIOGRAPHY IN HINDI | जीवनी, बायोग्राफी, हिस्ट्री, JIVANIJIVAN PARICHAYHISTORYJIVNIDOCUMENTARY

जीवन परिचय (जीवनी) / Biography 

परमवीर मेजर शैतान सिंह (1 दिसम्बर 1924 तथा मृत्यु 18 नवम्बर 1962) एक भारतीय सेना के एक अधिकारी थे। इन्हें मृत्यु के पश्चात परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया। इनका निधन 1962 के भारत-चीन युद्ध में हुआ था , इन्होंने अपने वतन के लिए काफी संघर्ष किया लेकिन अंत में शहीद हो गये तथा भारत देश का नाम रौशन कर गये।

जीवनी

शैतान सिंह का जन्म 01 दिसम्बर 1924 को एक राजपूत परिवार में हुआ तथा इनके पिता का नाम "हेम सिंह" था।

पृष्ठभूमि

सिंह 1 दिसंबर 1 9 24 को राजस्थान के जोधपुर जिले के बनसर गांव में पैदा हुए थे। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह भाटी थे।

सैन्य कार्रवाई

1 9 62 में चीन-भारतीय युद्ध में, शैतान सिंह की अगुवाई वाली 13 वीं कुमाऊं बटालियन की 'अहिर' कंपनी ने रेजांग ला में यह महत्वपूर्ण स्थान रखे, जो लद्दाख में चुशुल घाटी के दक्षिण-पूर्व दृष्टिकोण पर एक पास है। जम्मू और कश्मीर, 5,000 मीटर की ऊंचाई पर (16,404 फुट)। कंपनी क्षेत्र को तीन पट्टों की स्थिति से बचाव किया गया था और आसपास के इलाके को बाकी बटालियन से अलग कर दिया गया था। रेजांग ला पर चीनी हमले की उम्मीद 18 नवंबर को सुबह आई थी। यह बहुत ठंडा शीतकालीन रात का अंत था, हल्की बर्फ गिरने के साथ। रेज़ांग ला के माध्यम से बर्फीले हवाओं को काटने और बेंबलिंग पतली हवा और ठंड से अधिक, रेजांग ला के स्थान को अधिक गंभीर खामी था। यह एक हस्तक्षेप करने वाली सुविधा के कारण भारतीय तोपखाने से बना था, जिसका मतलब था कि उन्हें बड़े बंदूकों के सुरक्षात्मक आराम के बिना बनाना पड़ता था। सुबह की मंद रोशनी में, चीनी नंबर 7 और नं .8 प्लाटून पदों पर हमला करने के लिए नल्ला के माध्यम से आगे बढ़ते देखा गया।
चीनी हमलावरों का सामना करने के लिए भारतीय सेना के सैनिकों की तैयारी की स्थिति पर गिर गया। 05:00 को जब दृश्यता में सुधार हुआ तो दोनों पक्षियों ने राइफल्स, लाइट मशीनगनों, ग्रेनेड और मोर्टारों के साथ बढ़ते चीनी पर खुले हुए हैं। भारतीय तोपखाने का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। नालों मृत शरीर से भरे थे बचे हुए और मृत शरीर चीनी, हालांकि वे पहले ललाट हमले में विफल रहे, निराश नहीं हुए थे। उन्होंने 05:40 के बारे में तीव्र तोपखाने और मोर्टार फायर के लिए भारतीय पदों का पालन किया। जल्द ही, लगभग 350 चीनी सैनिकों ने नाल्लाओं के माध्यम से अग्रिम रूप से शुरू किया। इस बार, 9.9 प्लैटन, जो दुश्मन तक आग लगाकर 90 मीटर के भीतर था, अपने कब्जे में सभी हथियारों के साथ खुलता था। कुछ ही मिनटों के भीतर, नाले फिर से मृत शरीर से भरा हुआ था, मुख्यतः चीनी का

A statue of Shaitan Singh in a central square of his native city of Jodhpur, Rajasthan, India
ललाट हमले में असफल, दुश्मन, लगभग 400 मजबूत, फिर कंपनी की स्थिति के पीछे से हमला किया। उन्होनें साथ में नंबर 8 प्लाटून पर गहन मध्यम मशीन गन की आग खोला। यह हमले पोस्ट के कांटेदार तार बाड़ पर समाहित था। चीनी ने भारी तोपखाने और मोर्टार गोलाबारी का सहारा लिया। 120 चीनी के एक हमले समूह ने रियर से नं .7 प्लैटून की स्थिति भी तय की। हालांकि, भारतीय सेना के 3-इंच मोर्टार ने उनमें से कई को मार डाला जब 20 बचे लोगों ने इस पद पर आरोप लगाया था, तो करीब एक दर्जन कुमाइंस उनके हाथों से मुकाबला करने के लिए अपने खंदरों से बाहर निकल गए थे। इस बीच, चीनी ताजा सुदृढीकरण लाया। No.7 Platoon का घेरा अब पूरा हो गया था। पलटन, हालांकि, कोई जीवित नहीं था जब तक बहादुरी से लड़े नं .8 प्लाटून ने पिछले दौर में बहादुरी से लड़ाई लड़ी।
सिंह ने रेजांग ला की लड़ाई में अनुकरणीय नेतृत्व और साहस दिखाया। सभी खातों के द्वारा, उन्होंने अपने सैनिकों को सबसे अधिक सराहनीय ढंग से नेतृत्व किया। अपनी निजी सुरक्षा के बारे में सोचना वह एक पलटन पोस्ट से दूसरे स्थान पर चले गए और अपने लोगों से लड़ने को प्रोत्साहित किया। पदों के बीच चलते हुए वह एक चीनी मिजाज से गंभीर रूप से घायल हो गया था, लेकिन वह अपने पुरुषों के साथ लड़ना जारी रखा। जबकि उनके दो सहयोगियों ने उन्हें खाली किया जा रहा था, चीनी ने उन पर भारी मशीन गन की आग लगाई। सिंह ने अपने जीवन के लिए खतरा महसूस किया और उन्हें छोड़ने का आदेश दिया। उन्होनें उसे एक पहाड़ी की ढलानों पर एक बोल्डर के पीछे रखा, जहां वह मर गया, फिर भी अपने हथियार को पकड़ कर।
चीनी ने 21 नवंबर 1 9 62 को एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की।
इस कार्रवाई में, कुल 123 में से 114 अहिर मारे गए थे। 9 में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। चीनी को 1 हजार से अधिक हताहतों की संख्या का सामना करना पड़ा। युद्ध समाप्त होने के बाद, सिंह का शरीर एक ही जगह पर मिला, बुलेट घाव से मर गया और ठंड ठंड से मिला। यह जोधपुर के लिए भेजा गया था और पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था। सिंह को उनके नेतृत्व और कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र, सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पदक से सम्मानित किया गया था।

परम वीर चक्र प्रशस्ति पत्र

परमवीर चक्र के लिए दिए गए प्रशस्ति पत्र को पढ़ते हैं:
CITATION
मेजर शैतान सिंह
13 KUMAON (IC 7990)
मेजर शैतान सिंह 17,000 फीट की ऊंचाई पर चूसुल सेक्टर में रेजांग ला में तैनात एक पैदल सेना बटालियन की एक कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे। इलाके को मुख्य बचाव क्षेत्र से पृथक किया गया था और इसमें पांच प्लाटून-बचाव की स्थिति शामिल थी। 18 नवंबर 1 9 62 को, चीनी सेना ने कंपनी की स्थिति भारी तोपखाने, मोर्टार और छोटे हथियारों की आग के अधीन कर दी और लगातार कई तरंगों में भारी ताकत पर हमला किया। भारी बाधाओं के बावजूद, हमारे सैनिकों ने दुश्मन के हमले की लगातार लहरों को हराया। कार्रवाई के दौरान, मेजर शैतान सिंह ने परिचालन के दृश्य पर हावी रखा और एक पलटन पोस्ट से दूसरे निजी व्यक्ति को अपने कट्टरपंथी पठान पदों के मनोबल को बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत निजी जोखिम में चले गए। ऐसा करते समय वह गंभीर रूप से घायल हो गया था लेकिन अपने लोगों को प्रोत्साहित करना और नेतृत्व करना जारी रखा, जिन्होंने अपने बहादुर उदाहरण के बाद शूरता से लड़ा था और दुश्मन पर भारी हताहतों की संख्या दी थी। हमारे लिए खो गया हर आदमी के लिए, दुश्मन चार या पांच खो दिया। जब मेजर शैतान सिंह अपनी बाहों और पेट में घावों से विकलांग हो गए, तो उसके लोगों ने उसे खाली करने की कोशिश की लेकिन वे भारी मशीनगनों की आग में आ गए। मेजर शैतान सिंह ने तब अपने लोगों को अपने भाग्य के लिए अपने जीवन को बचाने के लिए छोड़ने का आदेश दिया।
मेजर शैतान सिंह के सर्वोच्च साहस, नेतृत्व और कर्तव्य के अनुकरणीय समर्पण ने लगभग आखिरी व्यक्ति से लड़ने के लिए अपनी कंपनी को प्रेरित किया।



चीनी सेना के काल : परमवीर मेजर शैतान सिंह

18 नवम्बर 1962 की सुबह अभी हुई ही नहीं थी, सर्द मौसम में सूर्यदेव अंगडाई लेकर सो रहे थे अभी बिस्तर से बाहर निकलने का उनका मन ही नहीं कर रहा था, रात से ही वहां बर्फ गिर रही थी। हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड के साथ ऐसी ठंडी बर्फीली हवा चल रही थी जो इंसान के शरीर से आर-पार हो जाये और इसी मौसम में जहाँ इंसान बिना छत और गर्म कपड़ों के एक पल भी नहीं ठहर सकता, उसी मौसम में समुद्र तल से 16404 फुट ऊँचे चुशूल क्षेत्र के रेजांगला दर्रे की ऊँची बर्फीली पहाड़ियों पर आसमान के नीचे, सिर पर बिना किसी छत और काम चलाऊ गर्म कपड़े और जूते पहने सर्द हवाओं व गिरती बर्फ के बीच हाथों में हथियार लिये ठिठुरते हुए भारतीय सेना की 13 वीं कुमाऊं रेजीमेंट की सी कम्पनी के 120 जवान अपने सेनानायक मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व में बिना नींद की एक झपकी लिये भारत माता की रक्षार्थ तैनात थे। 

एक और खुली और ऊँची पहाड़ी पर चलने वाली तीक्ष्ण बर्फीली हवाएं जरुरत से कम कपड़ों को भेदते हुये जवानों के शरीर में घुस पुरा शरीर ठंडा करने की कोशिशों में जुटी थी वहीँ भारत माता को चीनी दुश्मन से बचाने की भावना उस कड़कड़ाती ठंड में उनके दिल में शोले भड़काकर उन्हें गर्म रखने में कामयाब हो रही थी। यह देशभक्ति की वह उच्च भावना ही थी जो इन कड़ाके की बर्फीली सर्दी में भी जवानों को सजग और सतर्क बनाये हुये थी। 

अभी दिन उगा भी नहीं था और रात के धुंधलके और गिरती बर्फ में जवानों ने देखा कि कई सारी रौशनीयां उनकी और बढ़ रही है चूँकि उस वक्त देश का दुश्मन चीन दोस्ती की आड़ में पीठ पर छुरा घोंप कर युद्ध की रणभेरी बजा चूका था, सो जवानों ने अपनी बंदूकों की नाल उनकी तरफ आती रोशनियों की और खोल दी। पर थोड़ी ही देर में मेजर शैतान सिंह को समझते देर नहीं लगी कि उनके सैनिक जिन्हें दुश्मन समझ मार रहे है दरअसल वे चीनी सैनिक नहीं बल्कि गले में लालटेन लटकाये उनकी और बढ़ रहे याक है और उनके सैनिक चीनी सैनिकों के भरोसे उन्हें मारकर अपना गोला-बारूद फालतू ही खत्म कर रहे है।

दरअसल चीनी सेना के पास खुफिया जानकारी थी कि रेजांगला पर उपस्थित भारतीय सैनिक टुकड़ी में सिर्फ 120 जवान है और उनके पास 300-400 राउंड गोलियां और महज 1000 हथगोले है अतः अँधेरे और खराब मौसम का फायदा उठाते हुए चीनी सेना ने याक जानवरों के गले में लालटेन बांध उनकी और भेज दिया ताकि भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद खत्म हो जाये। जब भारतीय जवानों ने याक पर फायरिंग बंद कर दी तब चीन ने अपने 2000 सैनिकों को रणनीति के तहत कई चरणों में हमले के लिए रणक्षेत्र में उतारा।



मेजर शैतान सिंह Major Shaitan Singh ने वायरलेस पर स्थिति की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को देते हुये समय पर सहायता मांगी पर उच्चाधिकारियों से जबाब मिला कि वे सहायता पहुँचाने में असमर्थ है आपकी टुकड़ी के थोड़े से सैनिक चीनियों की बड़ी सेना को रोकने में असमर्थ रहेंगे अतः आप चैकी छोड़ पीछे हट जायें और अपने साथी सैनिकों के प्राण बचायें। उच्चाधिकारियों का आदेश सुनते ही मेजर शैतान सिंह के मस्तिष्क में कई विचार उमड़ने घुमड़ने लगे। वे सोचने कि उनके जिस वंश को उतर भड़ किंवाड़ की संज्ञा सिर्फ इसलिये दी गई कि भारत पर भूमार्ग से होने वाले हमलों का सबसे पहले मुकाबला जैसलमेर के भाटियों ने किया, आज फिर भारत पर हमला हो रहा है और उसका मुकाबला करने को उसी भाटी वंश के मेजर शैतान सिंह को मौका मिला है तो वह बिना मुकाबला किये पीछे हट अपने कुल की परम्परा को कैसे लजा सकता है? 

और उतर भड़ किंवाड़ कहावत को चरितार्थ करने का निर्णय कर उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर पूरी स्थिति साफ साफ बताते हुये कहा कि - मुझे पता है हमने चीनियों का मुकाबला किया तो हमारे पास गोला बारूद कम पड़ जायेगा और पीछे से भी हमें कोई सहायता नहीं मिल सकती, ऐसे में हमें हर हाल में शहादत देनी पड़ेगी और हम में से कोई नहीं बचेगा। चूँकि उच्चाधिकारियों का पीछे हटने हेतु आदेश है अतः आप में से जिस किसी को भी अपने प्राण बचाने है वह पीछे हटने को स्वतंत्र है पर चूँकि मैंने कृष्ण के महान युदुवंश में जन्म लिया है और मेरे पुरखों ने सर्वदा ही भारत भूमि पर आक्रमण करने वालों से सबसे पहले लोहा लिया है, आज उसी परम्परा को निभाने का अवसर मुझे मिला है अतः मैं चीनी सेना का प्राण रहते दम तक मुकाबला करूँगा. यह मेरा दृढ निर्णय है।
अपने सेनानायक के दृढ निर्णय के बारे में जानकार उस सैन्य टुकड़ी के हर सैनिक ने निश्चय कर लिया कि उनके शरीर में प्राण रहने तक वे मातृभूमि के लिये लड़ेंगे चाहे पीछे से उन्हें सहायता मिले या ना मिले. गोलियों की कमी पूरी करने के लिये निर्णय लिया गया कि एक भी गोली दुश्मन को मारे बिना खाली ना जाये और दुश्मन के मरने के बाद उसके हथियार छीन प्रयोग कर गोला-बारूद की कमी पूरी की जाय। और यही रणनीति अपना भारत माँ के गिनती के सपूत, २००० चीनी सैनिकों से भीड़ गये, चीनी सेना की तोपों व मोर्टारों के भयंकर आक्रमण के बावजूद हर सैनिक अपने प्राणों की आखिरी सांस तक एक एक सैनिक दस दस, बीस बीस दुश्मनों को मार कर शहीद होता रहा और आखिर में मेजर शैतान सिंह सहित कुछ व्यक्ति बुरी तरह घायलावस्था में जीवित बचे, बुरी तरह घायल हुए अपने मेजर को दो सैनिकों ने किसी तरह उठाकर एक बर्फीली चट्टान की आड़ में पहुँचाया और चिकित्सा के लिए नीचे चलने का आग्रह किया, ताकि अपने नायक को बचा सके किन्तु रणबांकुरे मेजर शैतान सिंह ने इनकार कर दिया। और अपने दोनों सैनिकों को कहा कि उन्हें चट्टान के सहारे बिठाकर लाईट मशीनगन दुश्मन की और तैनात कर दे और गन के ट्रेगर को रस्सी के सहारे उनके एक पैर से बाँध दे ताकि वे एक पैर से गन को घुमाकर निशाना लगा सके और दुसरे घायल पैर से रस्सी के सहारे फायर कर सके क्योंकि मेजर के दोनों हाथ हमले में बुरी तरह से जख्मी हो गए थे उनके पेट में गोलियां लगने से खून बह रहा था जिस पर कपड़ा बाँध मेजर ने पोजीशन ली व उन दोनों जवानों को उनकी इच्छा के विपरीत पीछे जाकर उच्चाधिकारियों को सूचना देने को बाध्य कर भेज दिया।

सैनिकों को भेज बुरी तरह से जख्मी मेजर चीनी सैनिकों से कब तक लड़ते रहे, कितनी देर लड़ते रहे और कब उनके प्राण शरीर छोड़ स्वर्ग को प्रस्थान कर गये किसी को नहीं पता. हाँ युद्ध के तीन महीनों बाद उनके परिजनों के आग्रह और बर्फ पिघलने के बाद सेना के जवान रेडक्रोस सोसायटी के साथ उनके शव की तलाश में जुटे और गडरियों की सुचना पर जब उस चट्टान के पास पहुंचे तब भी मेजर शैतान सिंह की लाश अपनी एल.एम.जी गन के साथ पोजीशन लिये वैसे ही मिली जैसे मरने के बाद भी वे दुश्मन के दांत खट्टे करने को तैनात है।

मेजर के शव के साथ ही उनकी टुकड़ी के शहीद हुए 114 सैनिकों के शव भी अपने अपने हाथों में बंदूक व हथगोले लिये पड़े थे, लग रहा था जैसे अब भी वे उठकर दुश्मन से लोहा लेने को तैयार है।

इस युद्ध में मेजर द्वारा भेजे गये दोनों संदेशवाहकों द्वारा बताई गई घटना पर सरकार ने तब भरोसा किया और शव खोजने को तैयार हुई जब चीनी सेना ने अपनी एक विज्ञप्ति में कबुल किया कि उसे सबसे ज्यादा जनहानि रेजांगला दर्रे पर हुई। मेजर शैतान सिंह की 120 सैनिकों वाली छोटी सी सैन्य टुकड़ी को मौत के घाट उतारने हेतु चीनी सेना को अपने 2000 सैनिकों में से 1800 सैनिकों की बलि देनी पड़ी। कहा जाता है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को देख चीनी सैनिकों ने जाते समय सम्मान के रूप में जमीन पर अपनी राइफलें उल्टी गाडने के बाद उन पर अपनी टोपियां रख दी थी। इस तरह भारतीय सैनिकों को शत्रु सैनिकों से सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ था। शवों की बरामदगी के बाद उनका यथास्थान पर सैन्य सम्मान के साथ दाहसंस्कार कर मेजर शैतान सिंह भाटी को अपने इस अदम्य साहस और अप्रत्याशित वीरता के लिये भारत सरकार ने सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

जैसलमेर का प्राचीनतम इतिहास भाटी शूरवीरों की रण गाथाओं से भरा पड़ा है। जहाँ पर वीर अपने प्राणों की बाजी लगा कर भी रण क्षेत्र में जूझते हुए डटे रहते थे। मेजर शेतान सिंह की गौरव गाथा से भी उसी रणबंकुरी परम्परा की याद ताजा हो जाती है। स्वर्गीय आयुवान सिंह ने परमवीर मेजर शैतान सिंह के वीरोचित आदर्श पर दो शब्द श्रद्धा सुमन के सद्रश लिपि बद्ध किये है। कितने सार्थक है:---
रजवट रोतू सेहरो भारत हन्दो भाण
दटीओ पण हटियो नहीं रंग भाटी सेताण

जैसलमेर जिले के बंसार (बनासर) गांव के ले.कर्नल हेमसिंह भाटी के घर 1 दिसम्बर 1924 को जन्में इस रणबांकुरे ने मारवाड़ राज्य की प्रख्यात शिक्षण संस्था चैपासनी स्कुल से शिक्षा ग्रहण कर एक अगस्त 1949 को कुमाऊं रेजीमेंट में सैकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्ति प्राप्त कर भारत माता की सेवा में अपने आपको प्रस्तुत कर दिया था। मेजर शैतान सिंह के पिता कर्नल हेमसिंह भी अपनी रोबीली कमांडिंग आवाज, किसी भी तरह के घोड़े को काबू करने और सटीक निशानेबाजी के लिये प्रख्यात थे।
(मेजर शैतान सिंह जी भाटी के दोहिते रिछपाल सिंह राठौड़ से बातचीत के आधार पर)


मेजर शैतान सिंह: दो महीने बाद मिला था शव, तब भी उंगली ट्रिगर पर थी


1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध में भारत ने कम संसाधनों के बाद भी चीन का सामना किया और कई मोर्चों पर उसके दांत खट्टे किए। युद्ध भूमि में भारत ने अपने कई वीर सपूत भी खोए, इन्हीं में से एक थे मेजर शैतान सिंह।
37 साल के शैतान सिंह के नेतृत्व में 13वीं कुमाऊंनी बटालियन की सी कंपनी ने 16000 फीट ऊंचाई पर स्थित रेजांग ला दर्रे में चीनी सैनिकों का सामना किया था। 123 सैनिकों के साथ शैतान सिंह अपनी पोस्ट पर जमे रहे।
कहा जाता है कि चीनी सैनिकों की टुकड़ियों ने आक्रमण किया लेकिन शैतान सिंह और उनके साथियों ने 1000 से अधिक चीनी सैनिकों की जान ले ली। इस सीधी टक्कर में भारत के भी 109 सैनिक मारे गए। शैतान सिंह खुद जख्मी होने के बाद भी सैनिकों का हौंसला बढ़ाते रहते थे।
दो हजार से अधिक चीनी सैनिकों ने शैतान सिंह और उनके साथियों की पोस्ट पर हमला किया था। भारत के हर जवान के पास केवल 400 राउंड गोलियां थीं और हथगोले भी बेहद कम थे। भारत के 123 सैनिक हड्डियां जमा देने वाली ठंड में उन चीनी सैनिकों का मुकाबला कर रहे थे जिनके पास आपार संसाधन थे और संख्या में भी वह ज्यादा थे।
कहते हैं कि सुबह के वक्त चीनी सेना ने हमला किया था और दिन भर की लड़ाई के बाद चीनी सेना को लगा कि भारत की यह टुकड़ी संख्याबल में उतनी छोटी नहीं है जैसा वह सोच रहे थे। इसके बाद चीनी सैनिक पीछे हटने लगे।
इसी दौरान शैतान सिंह को गोलियां लग गईं। उनके साथी हवलदार ने उनसे कहा कि वे नीचे चलें ताकि इलाज शुरु किया जा सके। लेकिन शैतान सिंह ने इलाज की बजाय अपने फर्ज को प्राथमिकता दी और सैनिकों का हौंसला बढाते रहे।
एक के बाद एक सैनिक शहीद हो रहे थे। अपने साथियों की जान जाते देख कर शैतान सिंह का खून खौल उठा और घायल अवस्था में भी उन्होंने बंदूक उठा ली। उन्होंने और उनके साथियों ने अपना सर्वस्व भारत माता पर न्यौछावर कर दिया और शहीद हो गए।
शव बर्फ से ढंक गए और उनकी कहानी शायद ही दुनिया तक पहुंच पाती। दो महीने बाद जब चुशूल गांव के गड़रिए रजांगला दर्रे पर जब भेड़ चराने गए तो उन्हें सैनिकों के शव नजर आए। इस बात का पता जब भारत सरकार को चला तो एक फौजी टुकड़ी वहां पहुंची।
इस टुकड़ी ने पाया कि अंतिम सांस लेते हुए भी शैतान सिंह और बाकी भारतीय सैनिकों की उंगलियां रायफल के ट्रिगर पर थीं। कई जवानों के हाथों में हथगोले भी थे। थोड़ी दूरी पर करीब 1000 चीनी सैनिकों की लाशें भी मिलीं। मरणोपरांत शैतान सिंह को परमवीर चक्र से नवाजा गया।

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BIOGRAPHY/आत्मकथा

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