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शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

विजयदान देथा: राजस्थानी कथाकार


विजयदान देथा

विजयदान देथा: नोबेल के लिए नामित कथाकार




    उस दिन सुबह बिज्जी इंटरव्यू के नाम से ऐसे घबरा रहे थे, जैसे मां की गोद से उतरकर पहले दिन स्कूल जा रहा कोई बच्चा. साथ रहने वाले राजस्थानी लेखक मालचंद तिवाड़ी से वे बोले, ‘‘एक काम कर, तू ही विजयदान देथा बनकर बैठ जा और इंटरव्यू दे दे.’’ लेकिन फिर जब सफेद धोती, कुर्ता और जैकेट पहनकर तैयार हो गए तो पूछते हैं, ‘‘क्यो, लग रहा हूं न दूल्हे जैसा?’’
    बच्चों जैसी निश्छलता और हास्य बोध से भरे ये शख्स हैं राजस्थानी के प्रसिद्घ लेखक विजयदान देथा. जोधपुर से तकरीबन 100 किमी दूर एक कस्बेनुमा छोटे-से गांव बोरूंदा में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी. उन्हें लोग प्यार से बिज्जी कहते हैं. चार साल की उम्र में पिता को खो देने वाले बिज्जी ने न कभी अपना गांव छोड़ा, न अपनी भाषा. ताउम्र राजस्थानी में लिखते रहे और लिखने के सिवा कोई और काम नहीं किया. दो जोड़ी कपड़ों में संतोषी जीवन जिया. बहुत चाह भी नहीं थी. बोरूंदा के रास्ते में साइकिल की दुकान पर पंचर बनाने वाले से लेकर गायों को हंकाकर ले जा रहा किसान तक बिज्जी के घर का पता जानते हैं. जो पढ़ भी नहीं सकता, उसने उनकी कहानियां सुनी हैं. राजस्थान के गांवों में घर-घर में लोग बिज्जी की कहानियां सुनते-सुनाते हैं. राजस्थान की लोककथाओं को मौजूदा समाज, राजनीति और बदलाव के औजारों से लैस कर उन्होंने कथाओं की ऐसी फुलवारी रची है कि जिसकी सुगंध दूर-दूर तक महसूस की जा सकती है.vijay stories
    बिज्जी बड़े ही दिल से वह किस्सा सुनाते हैं, जब मैक्सिको के एक लेखक ने दूर अर्जेंटीना के एक गांव में कुछ मछुआरों को एक गीत गाते सुना. वे जाल डालते और गीत गाते जाते थे. आश्चर्य से भरकर लेखक ने मछुआरों से पूछा, ‘‘तुम्हें पता है यह गीत किसका है? क्या तुम पाब्लो नेरुदा को जानते हो?’’ अनपढ़ मछुआरे बोले, ‘‘कौन नेरुदा? हम तो बस इस गीत को जानते हैं.’’
    बिज्जी धीरे से अपनी आंखों के कोर पोंछते हैं, ‘‘कितना महान था वह कवि कि जिसके गीत दूर देश के मछुआरे गाते थे.’’ ऐसी ही हैं बिज्जी की कहानियां. उनकी पहचान से भी बड़ी हो गईं. हवाओं में घुली हुईं, खेतों में समाई हुईं.
    उनका तकरीबन पूरा साहित्य हिंदी में अनूदित हो चुका है. उनकी कहानियों पर दुविधा और परिणति जैसी फिल्में बनीं. हबीब तनवीर का प्रसिद्घ नाटक चरणदास चोर  उन्हीं की कहानी पर आधारित है. दुविधा  कहानी पर 2005 में अमोल पालेकर ने शाहरुख खान-रानी मुखर्जी को लेकर पहेली  फिल्म बनाई थी. कहानियों के इतने अकूत खजाने में से बिज्जी की कहानी पर ही फिल्म क्यों बनाई? यह सवाल पूछने पर अमोल पालेकर कहते हैं, ‘‘मुझे कोई दूसरी कहानी बताइए, जिसमें इतना रहस्य, रोमांच और रोमांस हो और साथ ही वह इतनी देशज भी हो.’’ इस फिल्म को फाइनेंस करने के अपने फैसले के बारे में शाहरुख खान कहते हैं, ‘‘मैं कहानी के जादू में बंध गया था.’’ बिज्जी को रानी मुखर्जी पसंद हैं. सचमुच किसी जवान दूल्हे जैसे मुस्कराते हुए वे कहते हैं, ‘‘गले लगाकर रानी ने कहा था, ‘थैंक  यू सो मच.’’
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    बिज्जी की पूरी मौजूदगी अथाह प्रेम से भरी है. लेकिन जिस प्रेम को वे आज तक भुला नहीं पाए, वह हैं उनकी पत्नी सायर कंवर. वे कहते हैं, ‘‘हमेशा मुझसे लड़ती रहती थी. मैं लिखने में लगा रहता और उसकी तो बस एक ही रट, ‘‘खाना खा लो, खाना खा लो.’’ पता नहीं यह बुढ़ापे की कमजोरी है या कुछ और. सचमुच सायर का जिक्र करते ही बिज्जी की आंखें भर आई हैं. वे चुपके से आंखों के कोर पोंछते हैं. उनके बेटे ने शानदार घर बनवाया है. हर ओर समृद्घि की चमक है. मोजैक की फर्श, सागौन के दरवाजे, शीशम का फर्नीचर, खूबसूरत रंग-रोगन. लेकिन बिज्जी आज भी घर के पिछवाड़े लोहे की सांकल, लकड़ी की खिड़की और दीवार में बने आले वाले उसी मामूली-से कमरे में रहते हैं, जिसमें अपनी पत्नी के साथ उन्होंने जिंदगी के 47 बरस गुजारे. कहते हैं, ‘‘कैसे भूल जाऊं, उसने किन तकलीफों में मेरा साथ दिया? धूप, गर्मी, बारिश और ठिठुरन में पास रही. और अब वह नहीं तो मैं अकेले सुंदर घर का सुख भोगूं? ये कैसे होगा?’’ बिज्जी तो उस दुनिया के वासी हैं, जहां जंगल में आग लगने पर हंस पेड़ों से कहते हैं, ‘‘हम तुम्हें छोड़कर क्यों उड़ जाएं? तुम्हारी छांह में हमने सुख पाया, फल खाया, जीवन पाया और अब जब संकट आया तो तुम्हें अकेला छोड़कर उड़ जाएं? ये न होगा.’’
    एक बार बिज्जी की कहानियों से गुजरिए, फिर उनके व्यक्तित्व से. मामूली-सी फांस भी नहीं दिखती. राजा-रानी, राजकुमार, घोड़ा, चिडिय़ा, पेड़ उनकी कहानियों के पात्र हैं. उन्होंने 14 भागों में राजस्थानी लोककथाओं को संकलित किया है. लेकिन कहते हैं, ‘‘यह तो उस समुद्र की एक बूंद भी नहीं है.’’ चर्चित कथाकार राजेंद्र यादव बिज्जी के बारे में कहते हैं, ‘‘उनकी कहानियां हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं. वे आजीवन शोरगुल से दूर किसी साधक की तरह सृजन के काम में लगे रहे. बिज्जी जैसा कोई दूसरा नहीं.’’ टैगोर के बाद बिज्जी ही भारतीय उपमहाद्वीप के एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिनका नाम 2011 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामित हुआ.
    86 साल के बिज्जी बूढ़े और कमजोर हो गए हैं, मुश्किल से बोल पाते हैं. पढ़ भी नहीं सकते. किताबों को घंटों हाथ में लिए उसके अक्षरों पर उंगलियां फिराते रहते हैं. दुख में कहते हैं, ‘‘बिना इनके क्या जीवन?’’ मालचंद तिवाड़ी इन दिनों बिज्जी के साथ रहकर 14 भागों में फैली उनकी किताब बातां री फुलवारी का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं और उनकी रोजमर्रा की बातों को एक डायरी में दर्ज भी कर रहे हैं. उनकी डायरी में लिखा है, ‘‘एक दिन अचानक बिज्जी बोले, ‘‘मृत्यु तो जीवन का शृंगार है. ये न हो तो कैसे काम चले? सोच, मेरे सारे पुरखे आज जिंदा होते तो क्या होता?’’ एक दिन बीकानेर के हरीश भादानी की मृत्यु पर तिवाड़ी की लिखी श्रद्घांजलि पढ़कर बोल उठे, ‘‘मुझ पर भी लिखकर पढ़ा दे मुझे. मरने के बाद तो दूसरे ही पढ़ेंगे, मैं कैसे पढूंगा?’’
    ऐसे हैं बिज्जी. वे न होंगे तब भी हम उन्हें पढ़ेंगे. दुनिया उन्हें पढ़ेगी. अपनी बातों की फुलवारी में बिज्जी हमेशा रहेंगे.


    पूरा नाम - विजयदान देथा
    अन्य नाम- देथा, बिज्जी
    जन्म-1 सितम्बर, 1926
    जन्म भूमि-बोरुंदा, जोधपुर
    मृत्यु -10 नवम्बर, 2013
    मृत्यु स्थान बोरुंदा, जोधपुर
    संतान- तीन पुत्र और एक पुत्री
    कर्म भूमि -राजस्थान
    कर्म-क्षेत्र लोककथाकार, उपन्यासकार, संपादक
    मुख्य रचनाएँ -बाताँ री फुलवारी, टिडो राव, कबू रानी, उलझन, अलेखुन हिटलर आदि
    भाषा राजस्थानी
    पुरस्कार-उपाधि- पद्म श्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार
    नागरिकता- भारतीय
    अन्य जानकारी -राजस्थानी भाषा में चौदह खडों में प्रकाशित बाताँ री फुलवारी के दसवें खण्ड को भारतीय राष्ट्रीय साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया, जो राजस्थानी कृति पर पहला पुरस्कार है।
    इन्हें भी देखें -कवि सूची, साहित्यकार सूची

    विजयदान देथा (अंग्रेज़ी: Vijaydan Detha, जन्म: 1 सितम्बर, 1926 - मृत्यु: 10 नवम्बर, 2013) जिन्हें 'बिज्जी' के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के प्रसिद्ध लेखक और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित व्यक्ति थे। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य चुड़ामणी पुरस्कार जैसे विभिन्न अन्य पुरस्कारों से भी समानित किया जा चुका था। विजयदान देथा की राजस्थानी भाषा में चौदह खडों में प्रकाशित बाताँ री फुलवारी के दसवें खण्ड को भारतीय राष्ट्रीय साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया, जो राजस्थानी कृति पर पहला पुरस्कार है।

    जीवन परिचय
    लोक कथाओं एवं कहावतों का अद्भुत संकलन करने वाले पद्मश्री विजयदान देथा की कर्मस्थली उनका पैथृक गांव बोरुंदा दा ही रहा तथा एक छोटे से गांव में बैठकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के साहित्य का सृजन किया। राजस्थानी लोक संस्कृति की प्रमुख संरक्षक संस्था रूपायन संस्थान (जोधपुर) के सचिव देथा का जन्म 1 सितंबर 1926 को बोरूंदा में हुआ। प्रारम्भ में 1953 से 1955 तक बिज्जी ने हिन्दी मासिक प्रेरणा का सम्पादन किया। बाद में हिन्दी त्रैमासिक रूपम, राजस्थानी शोध पत्रिका परम्परा, लोकगीत, गोरा हट जा, राजस्थान के प्रचलित प्रेमाख्यान का विवेचन, जैठवै रा सोहठा और कोमल कोठारी के साथ संयुक्त रूप से वाणी और लोक संस्कृति का सम्पादन किया। विजयदान देथा की लिखी कहानियों पर दो दर्जन से ज़्यादा फ़िल्में बन चुकी हैं, जिनमें मणि कौल द्वारा निर्देशित 'दुविधा' पर अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 1986 में उनकी कथा पर चर्चित फ़िल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा द्वारा निर्देशित फिल्म परिणीति काफ़ी प्रभावित हुई है। राजस्थान साहित्य अकादमी 1972-73 में उन्हें विशिष्ट साहित्यकार के रूप में सम्मानित कर चुकी है।[1]'दुविधा' पर आधारित हिंदी फिल्म 'पहेली' में अभिनेता शाहरुख खान और रानी मुखर्जी मुख्य भूमिकाओं में थे। यह उनकी किसी रचना पर बनी अंतिम फिल्म है।[2] रंगकर्मी हबीब तनवीर ने विजयदान देथा की लोकप्रिय कहानी 'चरणदास चोर' को नाटक का स्वरूप प्रदान किया था और श्याम बेनेगल ने इस पर एक फिल्म भी बनाई थी।

    कृतियाँ
    राजस्थानी भाषा में क़रीब 800 से अधिक लघुकथाएं लिखने वाले विजयदान देथा की कृतियों का हिंदी, अंग्रेज़ी समेत विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया। विजयदान देथा ने कविताएँ भी लिखीं और उपन्यास भी। वे कलात्मक दृष्टि से उतने सफल नहीं नहीं हो सके। संभवतः उनकी रचनात्मक क्षमता खिल पाई लोक कथाओं के साथ उनके अपने काम में। विजयदान देथा ने रंगमंच और सिनेमा को अपनी ओर खींचा। एक अच्छी ख़ासी आबादी है जो उन्हें 'चरणदास चोर' के माध्यम से ही जानती है। अमोल पालेकर, मणि कौल, प्रकाश झा, श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने उनकी कहानियों पर फिल्में बनाईं। हबीब तनवीर उनकी कहानी को अपनाने वाले रंग निर्देशकों में सबसे प्रसिद्ध हैं लेकिन देश भर में उनकी जाने कितनी कहानियों को मंच पर खेला गया, इसका कोई हिसाब नहीं है।[3]

    राजस्थानी कृतियाँ

    बाताँ री फुलवारी, भाग 1-14, 1960 - 1974, लोक लोरियाँ
    प्रेरणा (कोमल कोठारी द्वारा सह-सम्पादित) 1953
    सोरठा, 1956 - 1958
    टिडो राव, राजस्थानी की प्रथम जेब में रखने लायक पुस्तक, 1965
    उलझन, 1984, (उपन्यास)
    अलेखुन हिटलर, 1984, (लघु कथाएँ)
    रूँख, 1987
    कबू रानी, 1989, (बच्चों की कहानियाँ)
    राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोष। (संपादन)
    हिन्दी अनुवादित कृतियाँ

    अपनी मातृ भाषा राजस्थानी के समादर के लिए 'बिज्जी' ने कभी अन्य किसी भाषा में नहीं लिखा, उनका अधिकतर कार्य उनके एक पुत्र कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी में अनुवादित किया।

    उषा, 1946 (कविताएँ)
    बापु के तीन हत्यारे, 1948 (आलोचना)
    ज्वाला साप्ताहिक में स्तम्भ, 1949 – 1952
    साहित्य और समाज, 1960, (निबन्ध)
    अनोखा पेड़ (सचित्र बच्चों की कहानियाँ), 1968
    फूलवारी (कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी अनुवादित) 1992
    चौधरायन की चतुराई (लघु कथाएँ) 1996
    अन्तराल, 1997 (लघु कथाएँ)
    सपन प्रिया, 1997 (लघु कथाएँ)
    मेरो दर्द ना जाणे कोय, 1997 (निबन्ध)
    अतिरिक्ता, 1997 (आलोचना)
    महामिलन, (उपन्यास) 1998
    प्रिया मृणाल, 1998 (लघु कथाएँ)
    लोककथाओं के जादूगर
    राजस्थान की रंग रंगीली लोक संस्कृति को आधुनिक कलेवर में पेश करने वाले, लोककथाओं के अनूठे चितेरे विजयदान देथा यानी बिज्जी अपने पैतृक गांव में ही रहते थे, राजस्थानी में ही लिखते थे और हिन्दीजगत फिर भी उन्हें हाथोंहाथ लेता था। चार साल की उम्र में पिता को खो देने वाले श्री देथा ने न कभी अपना गांव छोड़ा, न अपनी भाषा। ताउम्र राजस्थानी में लिखते रहे और लिखने के सिवा कोई और काम नहीं किया। बने बनाए सांचों को तोड़ने वाले विजयदान देथा ने कहानी सुनाने की राजस्थान की समृद्ध परंपरा से अपनी शैली का तालमेल किया। चतुर गड़ेरियों, मूर्ख राजाओं, चालाक भूतों और समझदार राजकुमारियों की जुबानी विजयदान देथा ने जो कहानियां बुनीं उन्होंने उनके शब्दों को जीवंत कर दिया। राजस्थान की लोककथाओं को मौजूदा समाज, राजनीति और बदलाव के औजारों से लैस कर उन्होंने कथाओं की ऐसी फुलवारी रची है कि जिसकी सुगंध दूर-दूर तक महसूस की जा सकती है। दरअसल वे एक जादुई कथाकार थे। अपने ढंग के अकेले ऐसे कथाकार, जिन्होंने लोक साहित्य और आधुनिक साहित्य के बीच एक बहुत ही मज़बूत पुल बनाया था। उन्होंने राजस्थान की विलुप्त होती लोक गाथाओं की ऐसी पुनर्रचना की, जो अन्य किसी के लिए लगभग असंभव थी। सही मायनों में वे राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने उस अन्यतम भाषा में आधुनिक गद्य और समकालीन चेतना की नींव डाली। अपने लेखन के बारे में उनका कहना था- "हवाई शब्दजाल व विदेशी लेखकों के अपच उच्छिष्ट का वमन करने में मुझे कोई सार नज़र नहीं आता। आकाशगंगा से कोई अजूबा खोजने की बजाय पाँवों के नीचे की धरती से कुछ कण बटोरना यादा महत्त्वपूर्ण लगता है। अन्यथा इन कहानियों को गढ़ने वाले लेखक की कहानी तो अनकही रह जाएगी।" विजयदान देथा की कहानियाँ पढ़कर विख्यात फिल्मकार मणि कौल इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने तत्काल उन्हें लिखा- तुम तो छुपे हुए ही ठीक हो। ...तुम्हारी कहानियाँ शहरी जानवरों तक पहुँच गयीं तो वे कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ेंगे। ...गिद्ध हैं नोच खाएँगे। तुम्हारी नम्रता है कि तुमने अपने रत्नों को गाँव की झीनी धूल से ढँक रखा है। हुआ भी यही, अपनी ही एक कहानी के दलित पात्र की तरह- जिसने जब देखा कि उसके द्वारा उपजाये खीरे में बीज की जगह 'कंकड़-पत्थर' भरे हैं तो उसने उन्हें घर के एक कोने में फेंक दिया, किन्तु बाद में एक व्यापारी की निगाह उन पर पड़ी तो उसकी आँखें चौंधियाँ गयीं, क्योंकि वे कंकड़-पत्थर नहीं हीरे थे। विजयदान देथा के साथ भी यही हुआ। उनकी कहानियाँ अनूदित होकर जब हिन्दी में आयीं तो हिन्दी संसार की आँखें चौंधियाँ गयीं।[4]

    सम्मान और पुरस्कार
    2007 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित विजयदान देथा को 2011 के साहित्य नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था हालांकि बाद में यह अवॉर्ड टॉमस ट्रांसट्रॉमर को दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार भी प्रदान किए गए।

    निधन
    राजस्थानी लेखक विजयदान देथा का रविवार 10 नवंबर, 2013 को दिल का दौरा पड़ने से बोरुंदा गांव (जोधपुर) में निधन हो गया। उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं को पहचान और आधुनिक स्वरूप प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। 87 वर्षीय विजयदान देथा के परिवार में तीन पुत्र और एक पुत्री हैं।


    राजस्थानी कहानियां 
    माँ/विजयदान देथा/बिज्जी 
    हिंदी लघु कथाएँ 
    • मेहनत का सार 
    • बनिए का चक्कर 
    • विचित्र अधिकार 
    • मैं री मैं 
    • साधू की कमाई 
    बिज्जी की राजस्थानी कहानियों का हिंदी अनुवाद 
    • दोहरी जिन्दगी 
    अन्य रचनाएँ-

    सितम्बर 1926, बोरुंदा राजस्थान, 10 नवम्बर 2013

    बिज्जी के नाम से भी जाना था।

    हिन्दी

    अपनी मातृ भाषा राजस्थानी के के समादर के लिए 'बिज्जीने कभी अन्य किसी भाषा में नहीं लिखाउनका अधिकतर कार्य उनके एक पुत्र कैलाश कबीर द्वारा हिन्दी में अनुवादित किया

    • उषा, 1946, कविताएँ
    • बापु के तीन हत्यारे, 1948, आलोचना
    • ज्वाला साप्ताहिक में स्तम्भ, 1949-1952
    • साहित्य और समाज1960निबन्ध
    • अनोखा पेड़सचित्र बच्चों की कहानियाँ1968
    • फूलवारीकैलाश कबीर द्वारा हिन्दी अनुवादित,1992
    • चौधरायन की चतुराईलघु कथाएँ1996
    • अन्तराल1997लघु कथाएँ
    • सपन प्रिया1997लघु कथाएँ
    • मेरो दर्द ना जाणे कोय1997निबन्ध
    • अतिरिक्ता,1997, आलोचना
    • महामिलनउपन्यास1998
    • प्रिया मृणाललघु कथाएँ,      1998
    राजस्थानी कृतियाँ

    • बाताँ री फुलवारीभाग 1-141960 - 1974लोक लोरियाँ
    • प्रेरणा (कोमल कोठारी द्वारा सह-सम्पादित) 1953
    • सोरठा1956 - 1958
    • टिडो रावराजस्थानी की प्रथम जेब में रखने लायक पुस्तक1965
    • उलझन1984, (उपन्यास)
    • अलेखुन हिटलर1984, (लघु कथाएँ)
    • रूँख1987
    • कबू रानी1989, (बच्चों की कहानियाँ)
    • राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोष। (संपादन)
    • बाताँ री फुलवारीभाग 1-14, 1960-1975, लोक लोरियाँ
    • प्रेरणा कोमल कोठारी द्वारा सह-सम्पादित1953
    • सोरठा, 1956-1958
    • परम्पराइसमें  तीन विशेष चीजें सम्पादित हैं - लोक संगीतगोरा हातजाजेथवा रा * राजस्थानी लोक गीतराजस्थान के लोक गीतछः भाग1958

    प्रारम्भ में 1953 से 1955 तक बिज्जी ने हिन्दी मासिक प्रेरणा का सम्पादन किया। बाद में हिन्दी त्रैमासिक रूपमराजस्थानी शोध पत्रिका परम्परालोकगीतगोरा हट जाराजस्थान के प्रचलित प्रेमाख्यान का विवेचनजैठवै रा सोहठा और कोमल कोठारी के साथ संयुक्त रूप से वाणी और लोक संस्कृति का सम्पादन किया।

    रंगकर्मी हबीब तनवीर ने विजयदान देथा की लोकप्रिय कहानी 'चरणदास चोरको नाटक का स्वरूप प्रदान किया था और श्याम बेनेगल ने इस पर एक फिल्म भी बनाई थी।

    राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र

    सही मायनों में वे राजस्थानी भाषा के भारतेंदु हरिश्चंद्र थेजिन्होंने उस अन्यतम भाषा में आधुनिक गद्य और समकालीन चेतना की नींव डाली।

    पुरस्कार और सम्मान


    • 1974 राजस्थानी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार
    • 1992 में भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार
    • 1995 का मरुधारा पुरस्कार
    • 2002 का बिहारी पुरस्कार
    • 2006 का साहित्य चूड़ामणि पुरस्कार
    • 2007 में पद्मश्री
    • 2011 मेहरानगढ़ संग्राहलय ट्रस्ट द्वारा राव सिंह पुरस्कार

    यह भी पढ़ें-

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