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मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

सरदार वल्लभ भाई पटेल ( Sardar Vallabh Bhai Patel)

∗ लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ∗

 – Sardar Vallabhbhai Patel Biography –


https://kvskidszone.blogspot.in/2017/10/sardaar-vallabh-bhai-patel-biography.html
(꠰) सरदार वल्लभ भाई पटेल 1875 – 1917 :
562 रियासतों का एकीकरण करने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड में उनके ननिहाल में हुआ. वे खेड़ा जिले के कारमसद में रहने वाले झावेर भाई पटेल की चौथी संतान थे. उनकी माता का नाम लाडबा पटेल था. उन्होंने प्राइमरी शिक्षा कारमसद में ही प्राप्त की. बचपन से ही उनके परिवार ने उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया.
1893 में 16 साल की आयु में ही उनका विवाह झावेरबा के साथ कर दिया गया था. उन्होंने अपने विवाह को अपनी पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया. 1897 में 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की. 1900 में ज़िला अधिवक्ता की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए, जिससे उन्हें वकालत करने की अनुमति मिली. गोधरा में वकालत की प्रेक्टिस शुरू कर दी. जहाँ इन्होने प्लेग की महामारी से पीड़ित कोर्ट ऑफिशियल की बहुत सेवा की.
1902 में इन्होने वकालत काम बोरसद सिफ्ट कर लिया, क्रिमिनल लॉयर रूप नाम कमाया. अपनी वकालत के दौरान उन्होंने कई बार ऐसे केस लड़े जिसे दूसरे निरस और हारा हुए मानते थे. उनकी प्रभावशाली वकालत का ही कमाल था कि उनकी प्रसिद्धी दिनों-दिन बढ़ती चली गई. गम्भीर और शालीन पटेल अपने उच्चस्तरीय तौर-तरीक़ों लिए भी जाने जाते थे. यंही उनके पुत्री मणिबेन का 1904 व पुत्र दह्या का 1905 में जन्म हुआ. बेरिस्टर कोर्स करने के लिए पैसों की बचत करली थी परन्तु बड़े भाई विठलभाई की इच्छा पूरी करने के लिए उनहोंने खुद न जाकर 1905 में उन्हें इग्लैंड भेज दिया.
सरदार पटेल अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी, समर्पण व हिम्मत से साथ पूरा करते थे.
उनके इस गुण का दर्शन हमें सन् 1909 की इस घटना से होते है.
वे कोर्ट में केस लड़ रहे थे, उस समय उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु (11 जनवरी 1909) का तार मिला. पढ़कर उन्होंने इस प्रकार पत्र को अपनी जेब में रख लिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं. दो घंटे तक बहस कर उन्होंने वह केस जीत लिया.
बहस पूर्ण हो जाने के बाद न्यायाधीश व अन्य लोगों को जब यह खबर मिली कि सरदार पटेल की पत्नी का निधन हुआ गया.
तब उन्होंने सरदार से इस बारे में पूछा तो सरदार ने कहा कि “उस समय मैं अपना फर्ज निभा रहा था, जिसका शुल्क मेरे मुवक्किल ने न्याय के लिए मुझे दिया था. मैं उसके साथ अन्याय कैसे कर सकता था.” ऐसी कर्तव्यपरायणता और शेर जैसे कलेजे की मिशाल इतिहास में विरले ही मिलती है.
इससे बड़ा चरित्र और क्या हो सकता है?
जुलाई, 1910 में वल्लभ भाई पटेल स्वयं भी इंगलैंड जाकर मिडल टेम्पल (Middle Temple) में लॉ की पढ़ाई के लिए दाखिला ले लिया. वहाँ उन्होंने आधी समयावधि में ही पूरा कोर्स कर लिया. वहां फर्स्ट डिविजन के साथ फर्स्ट रेंक हासिल की जिसके लिए उन्हें 50 पौंड इनाम भी मिला. 1912 में एग्जाम निपटते ही दूसरे दिन भारत के लिए रवाना हो गए. 1912 में ही इनके बड़े भ्राता विठलभाई, बोम्बे काउंसिल के मेम्बर चुने गए.
Sardar Patel real life inspirational Story in Hindi. (2)
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मिडल टेम्पल (Middle Temple)
Sardar Patel real life inspirational Story in Hindi.
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मिडल टेम्पल (Middle Temple Inn)
जनवरी 1913 में मिडल टेम्पल (Middle Temple Inn) के बेरिस्टर (Bar-at-Law) बन गए. इसके बावजूद वे अगले ही महीने 13 फरवरी को स्वदेश लौट गए अहमदाबाद में प्रेक्टिस शुरू करदी और जल्द ही देश के अग्रिम पंक्ति के क्रिमिनल लॉयर बन गए, मार्च 1914 में इनके पिता झावेरभाई का देहांत हो गया.
1915 में गुजरात सभा के मेम्बर बने. 1917 में अहमदाबाद मुनिसिपलिटी के काउंसलर चुने गए तथा सिनेटरी व पब्लिक वर्क्स कमिटी के चेयरमेन भी बने.
नवम्बर 1917 में पहली बार गाँधी जी से सीधे संपर्क में आये. 1918 में अहमदाबाद जिले में अकाल राहत का बहुत व्यवस्थित ढंग से प्रबंधन किया अहमदाबाद Municipal Board से गुजरात सभा को अच्छी धनराशी मंजूर करवाई जिससे इंफ्लुएंजा जैसी महामारी से निपटने के लिए एक अस्थाई हॉस्पिटल स्थापित किया. 1918 में ही सरकार द्वारा अकाल प्रभावित खेड़ा जिले में वसूले जा रहे लैंड रेवेन्यु के विरुद्ध “No-Tax” आन्दोलन का सफल नेतृत्व कर वसूली को माफ़ करवाया. गुजरात सभा को 1919 में गुजरात सूबे की काग्रेस कमिटी में परिवर्तित कर दिया जिसके सचिव पटेल तथा अध्यक्ष महात्मा गाँधी बने.(꠱) सरदार वल्लभ भाई पटेल 1917 -1930 :
1920 के असहयोग आन्दोलन में सरदार पटेल ने स्वदेशी खादी, धोती, कुर्ता और चप्पल अपनाये तथा विदेशी कपड़ो की होली जलाई. Ahmedabad Municipal चुनाव में सभी ओपन सीटों पर जीत दर्ज की. तिलक स्वराज फण्ड के लिए 10 लाख रुपये एकत्रित किये. केवल गुजरात में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ३ लाख सदस्य बनाये. गांधी से मिलकर गुजरात विद्यापीठ स्थापित करने का निर्णय किया.
1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 36 वें अहमदाबाद अधिवाशन की स्वागत समिति के अध्यक्ष बने. वे गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमिटी के पहले अध्यक्ष बने.
1922 में सरकार ने बोरसद तालुका की समस्त जनता पर  हदीया (Haidiya)नाम से एक दंडात्मक कर थोप दिया जिसके विरोध में पटेल 1922-23 में बोरसद में सत्याग्रह कर पिंड छुड़वाया. इसके बाद गांधी वल्लबभाई को “King of Borsad” कहते थे. इसी दौरान 1922 में नागपुर में राष्ट्रीय झंडा आदोलन का सफल नेतृत्व किया. 1922 में ही गुजरात विद्यापीठ के लिए रंगून से करीब 10 लाख रुपये एकत्रित करके लाये.
चुनाव जीतकर 1923 में अहमदाबाद नगरपालिका (Ahmedabad Municipality) के निर्वाचित अध्यक्ष बने.
1927 में गुजरात तब तक की सबसे भयानक बाढ़ आई जिससे निपटने के लिए सरकार से एक करोड़ रुपये मंजूर करवाए.
1928 में अहमदाबाद नगरपालिका (Ahmedabad Municipality) के अध्यक्ष पद से स्तीफा देकर मोरबी में हुए कठियावाड सम्मलेन की अध्यक्षता की.
1928 में खेड़ा जिले के किसानों के बारडोली में No-Tax सत्याग्रह अभियान का सफल नेतृत्व किया जहाँ किसानों ने इनको सरदार की उपाधि दी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भी इस उपाधि सार्वजानिक मान्यता दे दी. 1929 में महाराष्ट्र राजनैतिक सम्मलेन की अध्यक्षता की तथा पूरे महाराष्ट्र में घूमे.
(꠲) सरदार वल्लभ भाई पटेल 1930 -1946 :
गांधीजी के नमक सत्याग्रह के पक्ष में प्रचार करने के कारण इनको 7 मार्च, 1930 को गिरफ्तार कर साबरमती जेल में डाल दिया. जहाँ इन्होंने भूख हड़ताल कर, इनके स्टेटस के अनुरूप दी जा रही A class diet की जगह C class diet देने की प्रार्थना की. जिसे जेल प्रशासन को स्वीकार करना पड़ा.
26 जून, 1930 को रिहा कर दिया. 31 जुलाई, 1930 फिर गिरफ्तार कर तीन महीने के लिए कारावास की सजा दे दी गयी.
1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन की अध्यक्षता की. वायसराय लार्ड इरविन के साथ शिमला वार्ता में गांधीजी के साथ रहे
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान ही फिर गिरफ्तार कर जनवरी 1932 – जुलाई 1934 तक यरवदा जेल में गांधीजी के साथ कैद रखा. इसी दौरान उनके बड़े भाई विट्ठलभाई की जिनेवा के पास एक क्लिनिक में मृत्यु हो गयी. मनिबेन व कस्तुबा गाँधी को भी अल्प समय के लिए इसी जेल में रखा गया. नाक की गंभीर बीमारी कारण इन्हें जुलाई 1934 में रिहा करना पड़ा.
1935 से 1942 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संसदीय बोर्ड के चेयरमैन रहे. 1937-39 आठ सूबों में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों के प्रवेक्षक रहे. चुनावों में उम्मीदवारों के चयन का कार्यभार भी इन्हीं पर था.
ग्रेट ब्रिटेन पर भारत की स्वतंत्रता लिए दबाव हेतु गांधीजी के सत्याग्रह में भाग लेने पर 18 नवम्बर, 1940 को Defense of India Act तहत गिरफ्तार कर लिया गया. आंत की गंभीर बीमारी के कारण अगस्त 1941 में रिहा करना पड़ा.
एक वर्ष बाद ही भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने पर अगस्त 1942 में अहमदनगर फोर्ट में नेहरु, आजाद व कई बड़े नेताओं के साथ इन्हें भी जेल में डाल दिया. बाद में 1945 के शुरुवात में यरवदा जेल शिफ्ट कर दिया गया. जून 1945 में शिमला वार्ता में भाग लेने हेतु जेल से रिहा करना पड़ा.
(꠰V) सरदार वल्लभ भाई पटेल 1946 – 1950 :
2 सितम्बर, 1946 सरदार पटेल अंतरिम सरकार में गृह, सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने. (जिसके मुखिया नेहरु वाइसराय की कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष थे.)
4 अप्रैल, 1947 को वल्लभ विद्यानगर में विट्ठलभाई महा विद्यालय का उदघाटन किया.
भारत सरकार ने 25 जून, 1947 को रियासतों के लिए सरदार पटेल अधीन एक नया विभाग Department of (Princely) States बनाने का निर्णय किया.
सरदार 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र भारत के पहले उप प्रधानमंत्री तथा गृह, स्टेट्स, सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने.
13 नवम्बर, 1947 को सोमनाथ पतन का दौरा किया तथा सोमनाथ महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार कराने का निश्चय किया.
नागपुर, बनारस तथा अल्लाहाबाद विश्वविद्यालय ने क्रमश: 3, 25 व 27 नवम्बर 1948 को सरदार पटेल को Doctor of Laws डिग्री प्रदान की.
15 फरवरी, 1948 भावनागर राज्य संघ की स्थापना की. 7अप्रैल, 1948 को राजस्थान राज्य संघ की स्थापना की. 22 अप्रैल, 1948 को मध्य/भारत संघ की स्थापना का एग्रीमेंट किया.
13-16 सितम्बर, 1948 हैदराबाद पुलिस एक्शन कर सेटल किया.
26 फरवरी, 1949 को उस्मानिया विश्वविद्यालय ने सरदार पटेल को Doctor of Laws डिग्री प्रदान की.
7 अक्टूबर – 15 नवम्बर, 1949 तक नेहरुजी की U.S., UK, and Canada की विदेश यात्रा के दौरान सफलता पूर्वक प्रधामंत्री की जिम्मेदारी संभाली.
15 दिसम्बर, 1950 को शेर-ए-हिंदुस्तान सरदार पटेल का निधन बॉम्बे में गया, बॉम्बे में ही उनका अंतिम संस्कार कर किया गया.
सरदार पटेल के निधन के 41 वर्ष बाद 1991 में भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया. यह अवार्ड उनके पौत्र विपिनभाई पटेल द्वारा स्वीकार किया गया.






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