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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

पाठ-14 लोकगीत

पाठ-14 लोकगीत

1. निबंध में लोकगीतों के किन पक्षों की चर्चा की गई है? बिंदुओं के रूप में उन्हें लिखो।
उत्तर:- 
प्रस्तुत निबंध में लोकगीतों का इतिहास, उनकी रचनात्मकता, जनमानस में लोकप्रियता, स्त्रियों का लोकगीतों में योगदान, उनके विभिन्न प्रकार, उनकी भाषा जैसे अनेक बिन्दुओं पर चर्चा की गई है।

2. हमारे यहाँ स्त्रियों के खास गीत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:- 
हमारे यहाँ स्त्रियों के खास गीत सावन में गाए जाने वाले कजरी गीत, त्योहार, विवाह, जन्मोत्सव, प्रेमी-प्रेमिका को छेड़ने वाले छेड़छाड़भरे गीत, पनघट व नदियों के किनारे, खेतों में गाए जाने वाले आदि स्त्रियों के कुछ खास गीत हैं।

3. निबंध के आधार पर और अपने अनुभव के आधार पर (यदि तुम्हें लोकगीत सुनने के मौके मिले हैं तो) तुम लोकगीतों की कौन-सी विशेषताएँ बता सकते हो?
उत्तर:- 
लोकगीतों की अपनी कई विशेषताएँ हैं –
• लोकगीतों को सुनने से ही हमें अपने मिट्टी से जुड़ाव का अनुभव होता है।
• लोकगीत हमें गाँव के जीवन से परिचित करवाते हैं।
• इनके साथ बजाए जाने वाले वाद्य यंत्र अत्यंत सरल होते हैं।
• इन गीतों से मन में उत्साह और उमंग का संचार होता है।
• इन गीतों को गाने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है।
• ये सरल और सहज गीत होते हैं।
• इनके रचनाकार स्त्री और पुरुष दोनों होते हैं।

4. ‘पर सारे देश के……अपने-अपने विद्यापति हैं’ इस वाक्य का क्या अर्थ है? पाठ पढ़कर मालूम करो और लिखो।
उत्तर:- 
कवि विद्यापति बड़े प्रसिद्ध कवि हैं आज भी विद्यापति के गीत पूरब में हमें सुनने के लिए मिलते हैं। परन्तु यहाँ पर कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि अपने-अपने इलाके में जो लोग इस प्रकार के लोकगीतों की रचना करते हैं वे विद्यापति हैं।

5. क्या लोकगीत और नृत्य सिर्फ़ गाँवों या कबीलों में ही पाए जाते हैं? शहरों के कौन से लोकगीत हो सकते हैं? इस पर विचार कर लिखो।
उत्तर:- 
लोकगीत और लोक नृत्य गाँवों या कबीलों में ही प्रसिद्ध हैं क्योंकि शहरी जीवन अति व्यस्त होता है। शहर में जगह की भी कमी पाई जाती है परन्तु कुछ खास अवसरों जैसे विवाह, त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान आदि पर यहाँ पर भी लोग अपने-अपने गाँवों से लोक कलाकार और लोक नर्तकों को बुलाते हैं।

6. जैसे-जैसे शहर फैल रहे हैं और गाँव सिकुड़ रहे हैं, लोकगीतों पर उनका क्या असर पड़ रहा है? अपने आसपास के लोगों से बातचीत करके और अपने अनुभवों के आधार पर एक अनुच्छेद लिखो।
उत्तर:- 
अब गाँव भी शहरीकरण से अछूते नहीं रह गए हैं। सिनेमा, घर-घर टेलीविजन, मनोरंजन के सस्ते साधन उपलब्ध हो जाने के कारण भी अब लोकगीत कम होते जा रहे हैं।

• भाषा की बात
7. ‘लोक’ शब्द में कुछ जोड़कर जितने शब्द तुम्हें सूझें, उनकी सूची बनाओ। इन शब्दों को ध्यान से देखो और समझो कि उनमें अर्थ की दृष्टि से क्या समानता है। इन शब्दों से वाक्य भी बनाओ। जैसे – लोककला।
उत्तर:- लोकप्रिय 
– मुंबई सिनेमाजगत से जुड़ी हस्तियों के लिए लोकप्रिय है।
लोकमंच – लोकमंच कलाकारों को अपनी कला दिखाने के लिए उपयुक्त माध्यम है।
लोकवाद्य – लोकवाद्यों की महत्ता अब कम होती जा रही है।
लोकहित – नेताओं को लोकहितों को ध्यान में रखकर योजनाएँ बनानी चाहिए।
लोकतंत्र – भारत के अलावा भी कई अन्य देशों में लोकतंत्र है।

8. ‘बारहमासा’ गीत में साल के बारह महीनों का वर्णन होता है। नीचे विभिन्न अंकों से जुड़े कुछ शब्द दिए गए हैं। इन्हें पढ़ो और अनुमान लगाओ कि इनका क्या अर्थ है और वह अर्थ क्यों है। इस सूची में तुम अपने मन से सोचकर भी कुछ शब्द जोड़ सकते हो –
इकतारा, सरपंच, चारपाई, सप्तर्षि, अठन्नी, तिराहा, दोपहर, छमाही नवरात्र।
उत्तर:- 
इकतारा – एक तार से बजने वाला वाद्य
सरपंच – पंचों का प्रमुख
चारपाई – चार पैरों वाली
सप्तर्षि – सात ऋषियों का समूह
अठन्नी – पचास पैसे का सिक्का
तिराहा – तीन रास्ते जहाँ मिलते हो
दोपहर – जब दिन के दो पहर मिलते हो
छमाही – छः महीने में होनेवाला
नवरात्र – नौ रातों का समूह

9. को, में, से आदि वाक्य में संज्ञा का दूसरे शब्दों के साथ संबंध दर्शाते हैं। पिछले पाठ (झाँसी की रानी) में तुमने का के बारे में जाना। नीचे ‘मंजरी जोशी’ की पुस्तक ‘भारतीय संगीत की परंपरा’ से भारत के एक लोकवाद्य का वर्णन दिया गया है। इसे पढ़ो और रिक्त स्थानों में उचित शब्द लिखो –
तुरही भारत के कई प्रांतों में प्रचलित है। यह दिखने ………अंग्रेज़ी के एस या सी अक्षर………तरह होती है। भारत………विभिन्न प्रांतों में पीतल या काँसे………बना यह वाद्य अलग-अलग नामों………जाना जाता है। धातु की नली………घुमाकर एस………आकार इस तरह दिया जाता है कि उसका एक सिरा संकरा रहे और दूसरा सिरा घंटीनुमा चौड़ा रहे। फ़ूँक मारने………एक छोटी नली अलग………जोड़ी जाती है। राजस्थान………इसे बर्गू कहते हैं। उत्तर प्रदेश………यह तूरी मध्य प्रदेश और गुजरात………रणसिंघा और हिमाचल प्रदेश……… नरसिंघा………नाम से जानी जाती है। राजस्थान और गुजरात में इसे काकड़सिंघी भी कहते हैं।
उत्तर:- 
तुरही भारत के कई प्रांतों में प्रचलित है। यह दिखने में अंग्रेजी के एस या सी अक्षर की तरह होती है। भारत के विभिन्न प्रांतों में पीतल या काँसे से बना यह वाद्य अलग-अलग नामों सेजाना जाता है। धातु की नली को घुमाकर एस का आकार इस तरह दिया जाता है कि उसका एक सिरा संकरा रहे और दूसरा सिरा घंटीनुमा चौड़ा रहे। फूँक मारने पर एक छोटी नली अलग से जोड़ी जाती है। राजस्थान में इसे बर्गू कहते हैं। उत्तर प्रदेश में यह तूरी मध्यप्रदेश और गुजरात में रणसिंघा और हिमाचलप्रदेश मेंनरसिंघा के नाम से जानी जाती है। राजस्थान और गुजरात में इसे काकड़सिंघी भी कहते हैं।

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