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रविवार, 30 जुलाई 2017

संचयन पाठ-03 कल्लू कुम्हार की उनाकोटी

1. ‘उनाकोटी’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए बतलाएँ कि यह स्थान इस नाम से क्यों प्रसिद्ध है?
उत्तर:- 
उना का अर्थ है एक करोड़ से एक कम। उनाकोटी में शिव की कोटि से एक कम मूर्तियाँ हैं। त्रिपुरा में एक स्थान है ‘उनाकोटी’। एक दंत कथा के अनुसार यहाँ शिव की एक करोड़ में एक मूर्ति कम है। इस कारण इसका नाम ‘उनाकोटी’ पड़ा।

2. पाठ के संदर्भ में उनाकोटी में स्थित गंगावतरण की कथा को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:- 
दंत कथा के अनुसार उनाकोटी में शिव की एक कोटि से एक कम मूर्तियाँ हैं। यहाँ पहाड़ी को काटकर शिव की विशाल आधार मूर्तियाँ बनी हैं। यहाँ भगीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण को चित्रित किया गया है कि वे गंगा को अपनी जटाओं में उलझा ले और लें और फिर धीरे-धीरे पृथ्वी पर बढ़ने दें। इससे गंगा का वेग घट गया। यही गंगा भागीरथी कहलाई।

3. कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से किस प्रकार जुड़ गया?
उत्तर:- 
उनाकोटी में हजारों मूर्तियाँ हैं। अभी तक इन मूर्तियों के निर्माता की पहचान नहीं हो पाई है। स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि उनाकोटी की मूर्तियों का निर्माता कल्लू कुम्हार था। वह पार्वती का भक्त था। वह शिव-पार्वती के साथ उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत पर जाना चाहता था। पार्वती के जोर डालने पर शिवजी तैयार तो हो गए, पर उन्होंने एक शर्त रखी कि उसे एक रात में शिव की कोटि (एक करोड़) मूर्तियाँ बनानी होंगी। जब भोर हुई तो मूर्तियाँ एक कोटि से कम निकलीं। उना का अर्थ है एक करोड़ से एक कम। इस युक्ति से शिव को कल्लू से पीछा छुड़ाने का बहाना मिल गया। कल्लू को अपनी मूर्तियों के साथ उनाकोटी में ही छोड़ दिया और चलते बने। इस प्रकार कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से जुड़ गया।

4. ‘मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई’ – लेखक के इस कथन के पीछे कौन-सी घटना जुड़ी है?
उत्तर:- 
लेखक के इस कथन के पीछे यह घटना जुड़ी है कि लेखक त्रिपुरा में शूटिंग करने में व्यस्त था। उसे सी.आर.पी.एफ. के जवान सुरक्षा प्रदान कर रहे थे। इन सुरक्षा कर्मियों ने लेखक का ध्यान निचली पहाडियों पर इरादतन रखे दो पत्थरों की तरफ खींचा। ‘दो दिन पहले सेना एक जवान यहीं विद्रोहियों द्वारा मारा गया था’ यह सुनकर लेखक की रीढ़ में एक झुरझुरी-सी दौड़ गई।

5. त्रिपुरा ‘बहुधार्मिक समाज’ का उदाहरण कैसे बना?
उत्तर:- 
त्रिपुरा में लगातार बाहरी लोग आते रहे। इससे यह बहुधार्मिक समाज का उदाहरण बना है। यहाँ उन्नीस अनुसूचित जन जातियाँ और विश्व के चार बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व है। यहाँ बौद्ध धर्म भी माना जाता है। अगरतला के बाहरी हिस्से में एक सुंदर बौद्ध मंदिर है। यहाँ शिव की उपासना की जाती है।

6. टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय किन दो प्रमुख हस्तियों से हुआ? समाज-कल्याण के कार्यों में उनका क्या योगदान था?
उत्तर:- 
टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय समाज सेविका मंजु ऋषिदास और लोकगायक हेमंत कुमार जमातिया नामक हस्तियों से हुआ।
मंजु ऋषिदास रेडियो कलाकार के अतिरिक्त नगर पंचायत में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व करती थीं। वे निरक्षर थीं, पर उन्हें अपने वार्ड की सबसे बड़ी आवश्यकता अर्थात् स्वच्छ पेयजल की पूरी जानकारी थी। उन्होंने वार्ड में नल लगवाने, नल का पानी पहुँचाने और गलियों में ईंटें बिछवाने के लिए कार्य किया था।

7. कैलासशहर के ज़िलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को क्या जानकारी दी?
उत्तर:- 
लेखक ने उत्तरी त्रिपुरा ज़िले के मुख्यालय कैलासशहर के जिलाधिकारी से मुलाकात की। जिलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को यह जानकारी दी कि आलू की बुआई के लिए आमतौर पर पारंपरिक आलू के बीजों की ज़रूरत दो मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पड़ती है। इसके बरक्स टी .पी . एस की सिर्फ १०० ग्राम मात्रा ही एक हेक्टेयर की बुआई के लिए काफ़ी होती है। त्रिपुरा की टी .पी .एस का निर्यात अब न सिर्फ असम, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश को बल्कि बांग्लादेश, मलेशिया और वियतनाम को भी किया जा रहा है।

8. त्रिपुरा के घरेलू उद्योगों पर प्रकाश डालते हुए अपनी जानकारी के कुछ अन्य घरेलू उद्योगों के विषय में बताइए?
उत्तर:- 
त्रिपुरा में आलू की खेती के साथ-साथ अनेकों घरेलू उद्योग चलते हैं; जैसे – अगरबत्ती बनाना, बाँस के खिलौने बनाना, गले में पहनने की मालाएँ बनाना, अगरबत्ती के लिए सीकों को तैयार किया जाता है। यह गुजरात और कर्नाटक भेजी जाती है। अन्य घरेलू उद्योगों में माचिस, साबुन, प्लास्टिक, जूते, कपड़े आदि के घरेलू उद्योग सर्वप्रसिद्ध हैं।

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